क्या पुलिस स्टेशन में कोई भी रिकॉर्ड कर सकता है वीडियो, जानें क्या कहते हैं नियम?
पुलिस स्टेशन का नाम सुनते ही आम आदमी के मन में एक अजीब-सी घबराहट पैदा हो जाती है। शिकायत दर्ज कराने गए किसी व्यक्ति के साथ अगर बदसलूकी हो, या पुलिसकर्मी FIR लिखने से मना कर दे, तो सबसे पहला ख्याल यही आता है — “मोबाइल निकालकर वीडियो बना लूं, सबूत रहेगा।” लेकिन ठीक उसी पल एक डर भी साथ बैठा होता है — कहीं यही वीडियो बनाना खुद मेरे ही खिलाफ मामला न बन जाए?
25 साल से अदालतों की कार्यवाही को आम भाषा में समझाते हुए एक बात हमेशा साफ नजर आई है: कानून जितना जटिल दिखता है, हकीकत में उतना उलझा नहीं होता — बस उसे सही ढंग से समझने की जरूरत होती है। तो चलिए, बिंदुवार समझते हैं कि पुलिस स्टेशन के अंदर वीडियो रिकॉर्डिंग को लेकर अदालतें, कानून और मौजूदा नियम असल में क्या कहते हैं।
क्या पुलिस स्टेशन कोई “गोपनीय” या “प्रतिबंधित” जगह है?
सबसे पहली और सबसे जरूरी बात — पुलिस स्टेशन कानूनी नजर में कोई सीक्रेट जगह नहीं है। कई अदालती फैसलों में यह साफ किया गया है कि पुलिस स्टेशन कोई पूरी तरह से सीक्रेट या प्रतिबंधित जगह नहीं है, बल्कि यह एक सार्वजनिक दफ्तर है। यानी यह उसी तरह एक सरकारी कार्यालय है जैसे कोई तहसील या नगर निगम दफ्तर — जहां आम जनता का आना-जाना कानूनन तय है।
बॉम्बे और गुजरात हाईकोर्ट समेत देश की कई बड़ी अदालतों ने अपने फैसलों में यह स्पष्ट किया है कि पुलिस स्टेशन कोई गोपनीय क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह जनता की सेवा के लिए बना एक सार्वजनिक कार्यालय है। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि सिर्फ थाने के अंदर वीडियो रिकॉर्ड करना अपने-आप में कोई अपराध नहीं है और न ही इतना करने भर से कोई व्यक्ति अपराधी बन जाता है।
बॉम्बे हाईकोर्ट का वह फैसला, जिसने पूरी बहस को दिशा दी
इस मुद्दे पर सबसे चर्चित उदाहरण महाराष्ट्र के वर्धा जिले का है। वर्धा के रहने वाले एक शख्स और उसके पड़ोसी के बीच विवाद हुआ, और मामला थाने पहुंचा। दोनों पक्षों के बीच पुलिस स्टेशन में बातचीत चल रही थी, तभी एक व्यक्ति ने अपने मोबाइल फोन में वह बातचीत रिकॉर्ड कर ली। इसके बाद पुलिस ने आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के तहत उसके खिलाफ मामला दर्ज कर दिया।
यह मामला जब अदालत पहुंचा, तो फैसला बेहद अहम साबित हुआ। आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम (Official Secrets Act, 1923) के तहत जासूसी रोकने के मकसद से कुछ चुनिंदा जगहों को ही “प्रतिबंधित क्षेत्र” माना गया है, जहां फोटो-वीडियो लेना मना है। इस कानून की धारा 2(8) और धारा 3 में इसका ब्योरा दिया गया है — लेकिन इस सूची में पुलिस स्टेशन शामिल ही नहीं है। इसी आधार पर बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ में जस्टिस मनीष पिताले और जस्टिस वाल्मीकि की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के तहत प्रतिबंधित क्षेत्रों की सूची में पुलिस स्टेशन शामिल नहीं है, इसलिए वहां वीडियो बनाना अपराध नहीं है, और उस व्यक्ति के खिलाफ दर्ज केस रद्द कर दिया गया।
यानी अगर पुलिस किसी पर सिर्फ “थाने में वीडियो बनाने” के आधार पर जासूसी या गोपनीयता कानून का केस थोपने की कोशिश करे, तो अदालत में वह टिकता नहीं है।
क्या पुलिसकर्मी से हो रही बातचीत भी रिकॉर्ड की जा सकती है?
हां। पुलिस स्टेशन में बातचीत को भी रिकॉर्ड किया जा सकता है, क्योंकि आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के तहत पुलिस स्टेशन “प्रतिबंधित क्षेत्र” नहीं है, इसलिए वहां वीडियो रिकॉर्डिंग करना कानूनन अपराध नहीं माना जाता। हालांकि इसके साथ एक शर्त भी जुड़ी है — यह ध्यान रखना जरूरी है कि रिकॉर्डिंग पुलिसकर्मी के कर्तव्य-निर्वहन में बाधा डालने वाली न हो।
अगर पुलिसकर्मी “प्राइवेसी” यानी निजता के अधिकार का हवाला दे तो?
यह सवाल भी बार-बार उठता है — क्या ड्यूटी पर मौजूद पुलिसकर्मी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले निजता के अधिकार का हवाला देकर रिकॉर्डिंग रुकवा सकता है? इस पर अदालतों की व्याख्या साफ है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीने और स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है, जिसमें निजता का अधिकार भी शामिल माना जाता है। लेकिन जब कोई पुलिस अधिकारी लोक सेवक के तौर पर अपनी सरकारी ड्यूटी निभा रहा हो, तो उसके उस समय के कामकाज को निजता के अधिकार से संरक्षण नहीं मिलता। इसलिए ड्यूटी के दौरान किसी पुलिस अधिकारी की वीडियो रिकॉर्डिंग करना अनुच्छेद 21 के तहत निजता के अधिकार का उल्लंघन नहीं माना जाता।
सीधी भाषा में — घर पर बैठा पुलिसकर्मी और ड्यूटी पर मौजूद पुलिसकर्मी, दोनों की कानूनी स्थिति अलग है। ड्यूटी के दौरान का काम “पब्लिक फंक्शन” है, इसलिए उस पर पारदर्शिता की मांग जायज मानी जाती है।
तलाशी और जब्ती के दौरान अब वीडियो बनाना अनिवार्य भी है
यहां एक और अहम बदलाव समझना जरूरी है। पुराने कानूनों की जगह लागू हुई नई भारतीय न्याय व्यवस्था के तहत, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के अनुसार पुलिस स्टेशनों में तलाशी और जब्ती की कार्यवाही के दौरान उन दृश्यों को मोबाइल फोन में वीडियो रिकॉर्ड करना अनिवार्य कर दिया गया है, ताकि पुलिस की मनमानी या अत्याचार पर अंकुश लगे। हालांकि इस वीडियो को रिकॉर्ड करने की मानक प्रक्रिया (SOP) को कानून में विस्तार से स्पष्ट नहीं किया गया है, यानी इसका व्यावहारिक क्रियान्वयन राज्यों और थानों के स्तर पर अलग-अलग हो सकता है। इस बदलाव की दिशा साफ बताती है कि कानून अब पारदर्शिता और जवाबदेही की तरफ बढ़ रहा है, न कि गोपनीयता की तरफ।
रिकॉर्डिंग करते वक्त किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है
पुलिस स्टेशन में वीडियो बनाने की “इजाजत” होने का यह मतलब हरगिज नहीं कि जैसे चाहें, जहां चाहें कैमरा घुमाया जा सकता है। कुछ सीमाएं समझना बेहद जरूरी है:
- सरकारी कामकाज में बाधा न बने: अगर रिकॉर्डिंग करते समय किसी पुलिसकर्मी की ड्यूटी बाधित होती दिखे, तो पुलिस “सरकारी काम में बाधा डालने” से जुड़ी धारा के तहत कार्रवाई कर सकती है। इसलिए रिकॉर्डिंग हमेशा शांतिपूर्ण ढंग से और उचित दूरी बनाकर करनी चाहिए।
- संवेदनशील जगहों से दूरी: मालखाना जहां हथियार रखे होते हैं, गोपनीय दस्तावेज, या थाने में मौजूद किसी महिला/पीड़िता की निजता — इन सबकी वीडियोग्राफी करना कानूनन गलत माना जा सकता है और इससे उल्टा आप पर ही मामला बन सकता है।
- मकसद साफ हो: अगर कोई पुलिसकर्मी रिश्वत मांग रहा है, बदतमीजी कर रहा है या शिकायत दर्ज करने से मना कर रहा है, तो सबूत के तौर पर शांतिपूर्वक वीडियो बनाना नागरिक अधिकार का हिस्सा माना जाता है, और सही तरीके से बनाया गया ऐसा वीडियो अदालत में मजबूत सबूत भी बन सकता है।

जरूरी सावधानी — कानून जानना काफी नहीं, समझदारी से इस्तेमाल भी जरूरी
एक अनुभवी कानूनी पत्रकार के तौर पर यह बात दोहराना जरूरी है — अदालती फैसले किसी खास मामले के तथ्यों पर आधारित होते हैं, इसलिए हर स्थिति में नतीजा एक जैसा नहीं होगा। अगर थाने में आपके साथ वाकई गलत व्यवहार हो रहा है, तो वीडियो एक भरोसेमंद सबूत बन सकता है — लेकिन इसे उकसावे या टकराव का जरिया बनाने से बचना चाहिए। अगर पुलिस आपकी रिकॉर्डिंग पर आपत्ति जताए, तो शांति से अपना कानूनी अधिकार बताएं, न कि विवाद बढ़ाएं।
निष्कर्ष
तो सीधा और साफ जवाब यह है — पुलिस स्टेशन कोई गोपनीय इलाका नहीं है, और वहां शांतिपूर्ण तरीके से वीडियो बनाना अपने-आप में अपराध नहीं है। बॉम्बे हाईकोर्ट का वर्धा वाला फैसला और आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, 1923 की सीमाएं इस बात की पुष्टि करती हैं। साथ ही BNSS के नए प्रावधान बताते हैं कि आने वाले समय में थानों के भीतर की कार्यवाही और भी ज्यादा पारदर्शी बनाई जा रही है। बस ध्यान इतना रखें कि रिकॉर्डिंग सरकारी कामकाज में बाधा न बने और किसी की वाजिब निजता का हनन न करे — यही संतुलन आपको कानून के दायरे में रखते हुए अपने अधिकारों की रक्षा करने देता है।




