लिव-इन रिलेशनशिप में भरण-पोषण? डी. वेलुसामी बनाम डी. पचाईअम्मल केस से समझिए पूरा कानून
पिछले तीन दशकों में भारतीय अदालतों की मेज पर एक सवाल बार-बार आया है — अगर शादी का कागज़ नहीं है, तो क्या रिश्ते का हक़ भी नहीं? यही सवाल जब 2010 में सुप्रीम कोर्ट के सामने पहुँचा, तो जस्टिस मारकंडेय काटजू और जस्टिस टी.एस. ठाकुर की बेंच ने एक ऐसा फैसला दिया जिसने लिव-इन रिलेशनशिप और भरण-पोषण के पूरे कानूनी ढांचे को नई दिशा दी। यह फैसला था — डी. वेलुसामी बनाम डी. पचाईअम्मल [(2010) 10 SCC 469]।
तीन दशक से अदालतों की गलियारों में घूमते इस विषय पर, एक पत्रकार के तौर पर मैंने अनगिनत केस देखे हैं जहाँ महिलाएं सालों साथ रहने के बाद भी सिर्फ इसलिए भरण-पोषण से वंचित रह गईं क्योंकि “निकाह” या “शादी” की औपचारिकता पूरी नहीं हुई थी। वेलुसामी केस इसी अन्याय को सुधारने की एक कोशिश था — मगर क्या यह कोशिश पूरी तरह कामयाब रही? आइए, पूरे मामले को कानूनी जटिलताओं से निकालकर आम भाषा में समझते हैं।
केस की पृष्ठभूमि: कहानी शुरू कहाँ से हुई
यह विवाद तमिलनाडु के कोयंबटूर से जुड़ा है। प्रतिवादी डी. पचाईअम्मल ने 2001 में पारिवारिक न्यायालय में सीआरपीसी की धारा 125 के तहत याचिका दायर की। उनका दावा था कि उनका विवाह अपीलकर्ता डी. वेलुसामी से 14 सितंबर 1986 को हुआ था, और वे उनके पिता के घर में करीब दो-तीन साल साथ रहे। इसके बाद वेलुसामी अपने पैतृक गांव लौट गए, हालांकि बीच-बीच में आते-जाते रहे। पचाईअम्मल का कहना था कि उनकी आय का कोई स्रोत नहीं है, जबकि वेलुसामी कोयंबटूर के एक स्कूल में शिक्षक के पद पर कार्यरत थे और मासिक लगभग दस हज़ार रुपये कमाते थे। उन्होंने भरण-पोषण के तौर पर पांच सौ रुपये प्रतिमाह की मांग की थी।
दूसरी ओर, वेलुसामी का पक्ष बिल्कुल अलग था। उनका कहना था कि वे पहले ही 25 जून 1980 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार लक्ष्मी नाम की महिला से विवाहित हो चुके थे, और उनका एक बेटा भी है जो ऊटी के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहा था। अपने दावे के समर्थन में उन्होंने राशन कार्ड, पत्नी का मतदाता पहचान पत्र, बेटे का स्थानांतरण प्रमाण पत्र और शादी की तस्वीरें जैसे दस्तावेज़ प्रस्तुत किए।
पारिवारिक न्यायालय ने 5 मार्च 2004 को फैसला सुनाया कि वेलुसामी का विवाह पचाईअम्मल से हुआ था, न कि लक्ष्मी से। मद्रास हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद वेलुसामी ने दोनों फैसलों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
सुप्रीम कोर्ट के सामने असली सवाल क्या था
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो अदालत के सामने दो बुनियादी सवाल थे — पहला, क्या वेलुसामी वाकई पहले से लक्ष्मी से विवाहित थे, और दूसरा, अगर हां, तो क्या पचाईअम्मल फिर भी भरण-पोषण की हक़दार हैं। यहीं से यह मामला सिर्फ एक पारिवारिक विवाद न रहकर एक बड़े कानूनी सिद्धांत की परीक्षा बन गया।
प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन: पहली बड़ी खामी
सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले निचली अदालतों की एक गंभीर प्रक्रियागत चूक की ओर इशारा किया। लक्ष्मी, जिनकी वैवाहिक स्थिति पूरे मामले के केंद्र में थी, को न तो नोटिस भेजा गया और न ही उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका दिया गया। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के वैवाहिक अधिकारों पर फैसला उसे सुने बिना नहीं किया जा सकता — यह प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांत का सीधा उल्लंघन है। इसी आधार पर कोर्ट ने निचली अदालतों के निष्कर्षों को खारिज करते हुए मामला पारिवारिक न्यायालय को दोबारा सुनवाई के लिए वापस भेज दिया।
“विवाह जैसा संबंध” की कानूनी कसौटी: फैसले का सबसे अहम हिस्सा
लेकिन इस फैसले को ऐतिहासिक बनाने वाला हिस्सा कुछ और था। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि सीआरपीसी की धारा 125 का दायरा सीमित है — यह सिर्फ उन महिलाओं पर लागू होती है जो कानूनी रूप से विवाहित हों या जिनका तलाक हुआ हो। लेकिन घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 का दायरा उससे कहीं बड़ा है। इस अधिनियम की धारा 2(f) में “घरेलू संबंध” की परिभाषा में ऐसे रिश्ते भी शामिल किए गए हैं जो “विवाह जैसी प्रकृति के” (relationship in the nature of marriage) होते हैं।
सवाल यह था कि आखिर कौन सा लिव-इन रिश्ता इस श्रेणी में आएगा। हर साथ रहने वाला जोड़ा इस कानूनी सुरक्षा का हक़दार नहीं हो सकता — वरना कानून का दुरुपयोग होने का खतरा रहता। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने अमेरिकी न्यायशास्त्र में इस्तेमाल होने वाली “कॉमन लॉ मैरिज” (common law marriage) की अवधारणा से प्रेरणा लेते हुए कुछ स्पष्ट शर्तें तय कीं।

कोर्ट द्वारा तय की गई चार शर्तें
अदालत ने कहा कि किसी लिव-इन रिश्ते को “विवाह जैसा संबंध” माने जाने के लिए निम्नलिखित शर्तें पूरी होनी चाहिए:
- समाज के सामने पति-पत्नी जैसी पहचान: दोनों साथी समाज के सामने खुद को पति-पत्नी की तरह प्रस्तुत करते हों।
- विवाह योग्य आयु: दोनों पक्ष कानूनी रूप से विवाह करने की आयु प्राप्त कर चुके हों।
- विवाह की पात्रता: दोनों पक्ष अन्यथा वैध विवाह करने के योग्य हों — यानी दोनों में से कोई पहले से विवाहित न हो।
- लंबे समय तक साथ रहना और “साझा घर”: दोनों पक्षों ने स्वेच्छा से एक साथ रहकर, एक लंबी अवधि तक खुद को दुनिया के सामने पति-पत्नी की तरह पेश किया हो, और अधिनियम की धारा 2(s) के तहत परिभाषित “साझा घर” में साथ रहे हों।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हर तरह का लिव-इन रिश्ता इस परिभाषा में नहीं आता। अगर कोई पुरुष केवल आर्थिक लाभ के लिए किसी महिला को “रखैल” (keep) के तौर पर रखता है, उसका खर्च उठाता है, लेकिन उसे समाज के सामने पत्नी जैसा दर्जा नहीं देता, तो ऐसा रिश्ता इस श्रेणी में शामिल नहीं होगा।
फैसले का व्यावहारिक असर: किसे मिलेगा फायदा, किसे नहीं
इस फैसले ने भारतीय कानून में पहली बार लिव-इन रिश्तों को एक स्पष्ट कसौटी दी, जिससे निचली अदालतों को केस-दर-केस फैसला लेने में मदद मिली। इसका सबसे बड़ा असर यह हुआ कि जो जोड़े वर्षों से पति-पत्नी की तरह सामाजिक रूप से मान्यता प्राप्त जीवन जी रहे थे, उन्हें घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत आर्थिक राहत का रास्ता मिल गया।
लेकिन इस फैसले की आलोचना भी कम नहीं हुई। कानूनी विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं का एक बड़ा तबका मानता है कि इन चार सख्त शर्तों ने संरक्षण के दायरे को बहुत सीमित कर दिया। खासकर उन महिलाओं के लिए यह फैसला मुश्किलें खड़ी करता है, जो धोखे से दूसरी पत्नी बनी हों, या जिन्हें यह पता ही न हो कि उनका साथी पहले से विवाहित है। ऐसी स्थितियों में “स्वेच्छा से विवाह जैसा जीवन जीना” साबित करना कठिन हो जाता है, जिससे कई पीड़ित महिलाएं कानूनी सुरक्षा के दायरे से बाहर रह जाती हैं।
संसद में भी उठा मामला
इस फैसले का असर सिर्फ अदालतों तक सीमित नहीं रहा। नवंबर 2010 में लोकसभा में भी इस विषय पर सवाल उठाया गया, जब सरकार से पूछा गया कि क्या इस फैसले के मद्देनज़र कानून में संशोधन का कोई प्रस्ताव है। इससे साफ पता चलता है कि यह फैसला सिर्फ एक कानूनी मिसाल नहीं, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक बहस का भी विषय बन गया था।
आज के दौर में इस फैसले की प्रासंगिकता
बदलते सामाजिक ढांचे में, जहां शहरी भारत में लिव-इन रिश्ते तेज़ी से आम होते जा रहे हैं, वेलुसामी केस आज भी अदालतों के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत बना हुआ है। बाद के कई फैसलों में भी इसी कसौटी का हवाला दिया गया है, हालांकि अलग-अलग हाईकोर्टों ने समय-समय पर इसकी शर्तों की व्याख्या को थोड़ा लचीला भी बनाया है, ताकि वास्तविक पीड़ितों को न्याय से वंचित न होना पड़े।
निष्कर्ष: कानून और इंसाफ़ के बीच की बारीक रेखा
डी. वेलुसामी बनाम डी. पचाईअम्मल केस हमें यह सिखाता है कि कानून केवल काले-सफेद नियमों का ढांचा नहीं, बल्कि समाज में बदलते रिश्तों को समझने और उन्हें न्यायसंगत ढंग से परिभाषित करने की एक सतत कोशिश है। इस फैसले ने लिव-इन रिश्तों को कानूनी पहचान तो दी, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि यह पहचान बिना शर्त नहीं मिलेगी। आने वाले वर्षों में जैसे-जैसे सामाजिक ढांचा और बदलेगा, अदालतों को इन शर्तों की व्याख्या और परिष्कृत करनी पड़ सकती है — ताकि कानून की कठोरता, इंसाफ़ की भावना पर हावी न हो जाए।




