NDPS एक्ट में Commercial Quantity होने पर भी बरी: गुवाहाटी हाईकोर्ट का चौंकाने वाला फैसला
Hobiqul Islam v. State of Assam | Criminal Appeal Nos. 144/2026 & 192/2023 | गुवाहाटी हाईकोर्ट | फैसले की तारीख: 24 अगस्त 2026
आम तौर पर यह धारणा है कि NDPS एक्ट के तहत जब “कॉमर्शियल क्वांटिटी” (Commercial Quantity) यानी व्यावसायिक मात्रा में नशीला पदार्थ जब्त होता है, तो आरोपी का बच पाना लगभग नामुमकिन होता है। सज़ा भी न्यूनतम 10 साल की सख्त कैद होती है। लेकिन गुवाहाटी हाईकोर्ट के एक हालिया फैसले ने यह साबित कर दिया कि अगर जांच एजेंसी ने कानून की मूल प्रक्रिया का पालन नहीं किया, तो चाहे कितनी भी बड़ी मात्रा में नशीला पदार्थ बरामद क्यों न हो, अदालत आरोपी को बरी कर सकती है। यही हुआ Hobiqul Islam v. State of Assam मामले में, जहाँ 105 किलोग्राम गांजे की बरामदगी के बावजूद दोनों अपीलकर्ताओं को बरी कर दिया गया।
मामले के तथ्य: कैसे हुई गिरफ्तारी और जब्ती
15 फरवरी 2020 को मजबत पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी को गुप्त सूचना मिली कि दो व्यक्ति एक स्विफ्ट डिज़ायर कार में लालपानी से मजबत की ओर गांजा ले जा रहे हैं। इसी आधार पर पुलिस ने बाहीपुखुरी लाइन नंबर 12 पर नाका चेकिंग लगाई। सुबह करीब 11 बजे संदिग्ध वाहन को रोका गया, जिसमें दोनों अपीलकर्ता सवार थे।
पूछताछ के दौरान दोनों ने कबूल किया कि वे वाहन की पिछली डिक्की में 30 किलोग्राम संदिग्ध गांजा ले जा रहे थे। पुलिस ने यह गांजा जब्त कर लिया। इसके बाद, अपीलकर्ताओं के इशारे पर, उसी दिन दोपहर करीब 2:30 बजे जयंत दैमारी नामक व्यक्ति के घर से अतिरिक्त 75 किलोग्राम गांजा बरामद किया गया — हालांकि जयंत दैमारी को गिरफ्तार नहीं किया जा सका। इस तरह कुल बरामदगी 105 किलोग्राम तक पहुँच गई, जो NDPS एक्ट के तहत स्पष्ट रूप से “कॉमर्शियल क्वांटिटी” की श्रेणी में आती है।
मामले में धारा 20(b)(ii)(C) के तहत आरोप तय हुए और विशेष न्यायाधीश, उदलगुड़ी की अदालत ने 22 दिसंबर 2022 को दोनों अपीलकर्ताओं को दोषी करार देते हुए 10-10 साल की सश्रम कैद और एक-एक लाख रुपये जुर्माने की सज़ा सुनाई थी।
हाईकोर्ट में उठाए गए दो बड़े कानूनी सवाल
अपीलकर्ताओं की ओर से पेश वकीलों ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए मुख्य रूप से दो आधार उठाए:
- सीज़र विटनेस असली गवाह नहीं थे — यानी जिन गवाहों के हस्ताक्षर जब्ती सूची (Seizure List) पर लिए गए, वे वास्तव में बरामदगी के समय मौके पर मौजूद ही नहीं थे।
- धारा 52A का पालन नहीं हुआ — जब्त गांजे की अनिवार्य इन्वेंटरी तैयार नहीं की गई और सैंपल मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में नहीं लिए गए।
गवाहों की गवाही में सामने आईं गंभीर खामियां
अदालत ने जब सातों प्रोसीक्यूशन गवाहों की गवाही का बारीकी से विश्लेषण किया, तो चौंकाने वाली बातें सामने आईं:
- PW-1 (चंद्र डेका) ने कहा कि उसे यह भी नहीं पता कि जिन कागज़ों पर उससे हस्ताक्षर लिए गए, उन पर क्या लिखा था।
- PW-2 (बीरमल दैमारी) ने साफ कहा कि उसके हस्ताक्षर उसके अपने घर पर लिए गए थे और वह कभी जयंत दैमारी के घर — जहाँ 75 किलो गांजा मिला — गया ही नहीं।
- PW-3 (सुदामा पानिकर) ने स्वीकार किया कि उसके हस्ताक्षर पुलिस स्टेशन में लिए गए, न कि जब्ती वाली जगह पर।
- PW-4 (रियल दैमारी) भी कभी बरामदगी वाली जगह पर नहीं गया।
अदालत ने अपने फैसले में टिप्पणी की कि इनमें से कोई भी गवाह यह साबित नहीं कर पाया कि अपीलकर्ताओं के कब्ज़े से नशीला पदार्थ वास्तव में बरामद हुआ था।
धारा 52A: क्यों है इतनी अहम?
NDPS एक्ट की धारा 52A जब्त किए गए नशीले पदार्थ की इन्वेंटरी तैयार करने, उसके नमूने मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में लेने और शेष माल को नियमानुसार नष्ट करने की अनिवार्य प्रक्रिया तय करती है। इस मामले में जांच अधिकारी (PW-7) ने खुद स्वीकार किया कि उसने कोई इन्वेंटरी तैयार ही नहीं की और न ही उच्च अधिकारियों को इसकी कोई अनुपालन रिपोर्ट भेजी। जब्त गांजा भी कभी ट्रायल कोर्ट के सामने पेश नहीं किया गया, और यह भी स्पष्ट नहीं हो सका कि आखिर उस बरामद माल का हुआ क्या।
अदालत ने इस बिंदु पर सुप्रीम कोर्ट की कई पुरानी मिसालों का हवाला देते हुए दोहराया कि धारा 52A की प्रक्रिया “अनिवार्य प्रकृति” की है, और चूंकि NDPS एक्ट में सज़ा बेहद कड़ी है, इसलिए अभियोजन पक्ष को इस प्रक्रिया का सख्ती से पालन करना ही होगा। किसी भी तरह की चूक सीधे अभियोजन पक्ष के मामले को कमज़ोर करती है और आरोपी को इसका फायदा मिलता है।
अदालत का फैसला
न्यायमूर्ति मृदुल कुमार कालिता की एकल पीठ ने पाया कि:
- कोई भी सीज़र विटनेस बरामदगी की पुष्टि नहीं कर सका।
- धारा 52A के तहत अनिवार्य इन्वेंटरी तैयार ही नहीं हुई।
- सैंपल मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में लिए जाने का कोई सबूत नहीं मिला — बल्कि रिकॉर्ड से यह पता चला कि सैंपल पुलिस स्टेशन में ही लिए गए थे।
- सैंपल की चेन ऑफ कस्टडी को लेकर भी गवाहों के बयान आपस में विरोधाभासी थे।
इन सभी खामियों को आधार बनाते हुए अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और दोनों अपीलकर्ताओं — होबीकुल इस्लाम और निजुत बोरमोहोलिया — को धारा 20(b)(ii)(C) के सभी आरोपों से बरी कर दिया, साथ ही आदेश दिया कि अगर किसी अन्य मामले में वांछित न हों तो उन्हें तुरंत रिहा किया जाए।
इस फैसले से क्या सीख मिलती है?
यह फैसला एक बार फिर याद दिलाता है कि NDPS जैसे कड़े कानूनों में भी सज़ा केवल बरामद मात्रा से तय नहीं होती — जांच एजेंसी को हर प्रक्रिया, हर दस्तावेज़ और हर गवाह की विश्वसनीयता कानून के मुताबिक साबित करनी होती है। अगर जांच में प्रक्रियागत खामियां रह जाएं, तो भले ही आरोपी “रंगे हाथों” पकड़ा गया हो, अदालत उसे बरी करने के लिए बाध्य हो सकती है। यह मामला जांच एजेंसियों के लिए एक सख्त चेतावनी है कि नशीले पदार्थों से जुड़े मामलों में प्रक्रियागत अनुशासन कोई विकल्प नहीं, बल्कि कानूनी बाध्यता है।
अस्वीकरण: यह लेख केवल सामान्य कानूनी जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से तैयार किया गया है। किसी विशिष्ट मामले में कानूनी सलाह के लिए कृपया किसी योग्य वकील से परामर्श करें। WhatsApp Number for Appointment Booking : +91-8980028995




