सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे मामले में अहम फैसला सुनाया है, जिसमें हत्या के आरोपी की ज़मानत रद्द करने की मांग की गई थी। दिलचस्प बात यह रही कि आरोपी ने ज़मानत पर रिहा होने के बाद सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट किया था, जिसमें उसने दावा किया था कि इस देश में “पैसे और ताकत से कुछ भी हासिल किया जा सकता है।” इस विवादित बयान के बावजूद शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के ज़मानत आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया।
मामला क्या है
यह पूरा प्रकरण अक्टूबर 2022 में हरियाणा के बेरला गांव में हुए एक ज़मीन विवाद से जुड़ा है, जो टिन शेड लगाने को लेकर शुरू हुआ था। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि विवाद के दौरान आरोपी विशाल ने एक महिला पर डंडे से हमला किया और गजानंद नामक व्यक्ति के सिर पर कुल्हाड़ी से वार किया। बाद में चोटों के कारण गजानंद की मौत हो गई। विशाल को 28 अक्टूबर 2022 को गिरफ्तार किया गया था।
लंबी कानूनी लड़ाई और बार-बार ज़मानत खारिज होना
विशाल की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं। फरवरी 2024 में एडिशनल सेशन जज ने उसकी ज़मानत अर्जी ठुकरा दी। इसके बाद पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में लगातार चार बार उसकी ज़मानत याचिकाएं खारिज हुईं। आखिरकार पांचवीं याचिका पर 23 अप्रैल 2026 को हाईकोर्ट ने उसे नियमित ज़मानत दे दी।
हाईकोर्ट ने ज़मानत क्यों दी
हाईकोर्ट के जस्टिस राजेश भारद्वाज ने ज़मानत देते समय कुछ अहम तथ्यों पर ध्यान दिया:
- पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतक के शरीर पर कोई कटा हुआ घाव नहीं पाया गया, जबकि आरोप कुल्हाड़ी से वार करने का था
- बरामद हथियार कुल्हाड़ी नहीं बल्कि डंडा था, जो आरोपों से मेल नहीं खाता
- सभी प्रमुख चश्मदीद गवाहों से पूछताछ पूरी हो चुकी थी
- विशाल तीन साल पांच महीने से ज़्यादा समय तक जेल में रह चुका था, जबकि 31 में से केवल 8 गवाहों की गवाही हुई थी
अदालत ने माना कि सुनवाई में इतनी देरी अनुच्छेद 21 के तहत मिले शीघ्र सुनवाई के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन है।
सोशल मीडिया वीडियो बना विवाद की वजह
ज़मानत मिलने के बाद आरोपी विशाल ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट किया, जिसमें उसने पैसे और ताकत के दम पर कुछ भी हासिल करने की बात कही। इस वीडियो से नाराज़ शिकायतकर्ता राजबाला ने इसे प्रभाव और धनबल के दुरुपयोग का सबूत मानते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और ज़मानत रद्द करने की मांग की।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने सुनवाई के दौरान इस तर्क को स्वीकार नहीं किया कि वीडियो से पैसे या रसूख के दुरुपयोग की झलक मिलती है। अदालत ने इसे आरोपी की सिर्फ अपनी आज़ादी का जश्न मनाने वाली प्रतिक्रिया बताया और टिप्पणी की कि अगर उसके पास वाकई पैसा और ताकत होती, तो वह जेल जाता ही नहीं — उसने जो पैसा खर्च किया वह महज़ वकील की फीस थी।
इसी आधार पर बेंच ने हाईकोर्ट के ज़मानत आदेश में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए शिकायतकर्ता की अपील खारिज कर दी और आरोपी की आज़ादी बरकरार रखी।
पक्षकारों की ओर से पेशी
शिकायतकर्ता की ओर से वकील सिद्धार्थ मित्तल पेश हुए, जबकि प्रतिवादी पक्ष का प्रतिनिधित्व वकील समर विजय सिंह और सतीश कुमार ने किया।
निष्कर्ष
यह मामला दिखाता है कि सुप्रीम कोर्ट ज़मानत जैसे मुद्दों पर फैसला करते समय भावनात्मक या सोशल मीडिया पर बने माहौल से ज़्यादा तथ्यों, साक्ष्यों और संवैधानिक अधिकारों को प्राथमिकता देता है। अनुच्छेद 21 के तहत शीघ्र सुनवाई का अधिकार और लंबी प्री-ट्रायल हिरासत जैसे पहलू अदालतों के फैसलों में अहम भूमिका निभाते हैं, भले ही जनभावना कुछ और कहे।




