कर्नाटक हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री पर कथित अपमानजनक टिप्पणी के मामले में दुकानदार के खिलाफ FIR रद्द की
मामला क्या है
बेलगावी जिले की अथानी पुलिस ने एक दुकानदार के खिलाफ FIR दर्ज की थी। शिकायत के मुताबिक, याचिकाकर्ता ने अपनी दुकान के सामने सड़क पर कुछ बैरिकेड लगा रखे थे, और जब शिकायतकर्ता ने उनसे इस बारे में सवाल किया, तो उसने कथित तौर पर भारत के प्रधानमंत्री के खिलाफ बयान दिए। इसी आधार पर कुछ दिन बाद शिकायत दर्ज कराई गई और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 285 (सार्वजनिक मार्ग में खतरा या बाधा) और धारा 352 (शांति भंग भड़काने के इरादे से जानबूझकर अपमान) के तहत FIR दर्ज की गई।
दुकानदार ने इस कार्रवाई को रद्द कराने के लिए कर्नाटक हाईकोर्ट का रुख किया, यह तर्क देते हुए कि शिकायतकर्ता को न तो अपमानित किया गया था और न ही गाली दी गई थी, और किसी राजनीतिक बयान को बिना अपराध के आवश्यक तत्वों के, व्यक्तिगत आपराधिक मुकदमे में नहीं बदला जा सकता।
अदालत में क्या दलीलें दी गईं
राज्य और शिकायतकर्ता की ओर से इस याचिका का विरोध किया गया। उनका तर्क था कि याचिकाकर्ता द्वारा लगाए गए बैरिकेड से जनता को असुविधा हुई थी, और प्रधानमंत्री के खिलाफ कथित अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल शांति भंग भड़काने के इरादे से किया गया था। चूंकि यह तथ्य का सवाल है, इसलिए याचिकाकर्ता को मुकदमे का सामना करना चाहिए, यह दलील दी गई।
हाईकोर्ट का फैसला — अपमान शिकायतकर्ता के प्रति होना चाहिए
न्यायमूर्ति वेंकटेश नाइक टी. की एकल पीठ ने CrPC की धारा 482 (अब BNSS की धारा 528) के तहत दायर याचिका को स्वीकार करते हुए अथानी पुलिस द्वारा दर्ज FIR को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि धारा 352 BNS के तहत अपराध तभी बनता है जब किसी व्यक्ति को जानबूझकर इस तरह उकसाया जाए कि वह शांति भंग करे — और यह उकसावा उसी व्यक्ति के प्रति होना चाहिए जो शिकायत कर रहा है, किसी तीसरे पक्ष के प्रति नहीं।
अदालत ने पाया कि शिकायत में स्वयं यह कहीं नहीं लिखा गया कि याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ता को अपमानित या गाली दी ताकि वह शांति भंग करे। एकमात्र आरोप यह था कि उसने प्रधानमंत्री के खिलाफ कोई बयान दिया था। कोर्ट के अनुसार, बिना शिकायतकर्ता के प्रति सीधे किसी अपमान के, ऐसे सामान्य और अस्पष्ट आरोप धारा 352 के दायरे में नहीं आते।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
फैसले में कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के मोहम्मद वाजिद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले का हवाला दिया, जिसमें भारतीय दंड संहिता की संबंधित धारा के संदर्भ में यह कहा गया था कि केवल गाली-गलौज, असभ्यता या रूखा व्यवहार तब तक जानबूझकर किया गया अपमान नहीं माना जाएगा, जब तक कि अपमानित व्यक्ति को शांति भंग के लिए उकसाने का इरादा या जानकारी साबित न हो। कोर्ट ने यह भी पाया कि धारा 285 भी इस मामले में लागू नहीं होती, और शिकायत दर्ज कराने में चार दिन की देरी का भी कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया था।
भजन लाल मामले में तय सिद्धांत को दोहराते हुए, जिसके अनुसार अगर आरोपों को पूरी तरह सही भी मान लिया जाए, फिर भी अगर वे किसी अपराध के तत्व नहीं बनाते, तो हाईकोर्ट अपने अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल कर सकता है — कोर्ट ने कहा कि इस मामले में कोई अपराध नहीं बनता और मुकदमे को जारी रखना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। नतीजतन, FIR और अथानी की प्रधान सिविल न्यायाधीश व JMFC अदालत में लंबित कार्यवाही, दोनों रद्द कर दी गईं।
यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है
यह आदेश एक अक्सर इस्तेमाल होने वाले प्रावधान के सटीक तत्वों पर केंद्रित है। धारा 352 BNS, पुरानी IPC की धारा 504 की तरह, ऐसे जानबूझकर किए गए अपमान को दंडित करती है जो किसी व्यक्ति को शांति भंग के लिए उकसाने के इरादे से या ऐसी संभावना जानते हुए किया गया हो। इसके दो मुख्य तत्व हैं — पहला, अपमान जानबूझकर और शांति भंग भड़काने के मकसद से होना चाहिए; और दूसरा, यह किसी खास व्यक्ति के प्रति निर्देशित होना चाहिए, आमतौर पर शिकायतकर्ता के प्रति, जिसकी प्रतिक्रिया को लेकर कानून चिंतित है। किसी तीसरे पक्ष के खिलाफ किया गया अपमान, जो अदालत के सामने मौजूद ही नहीं है, बिना किसी अतिरिक्त आधार के इस धारा को पूरा नहीं करता — क्योंकि यह प्रावधान अपमानित व्यक्ति को उकसावे से बचाने के लिए है, न कि किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा किसी और की तरफ से महसूस की गई नाराज़गी से।
यह फैसला कोर्ट की उस प्रवृत्ति को दर्शाता है जिसमें अदालतें आपराधिक प्रक्रिया को तब शुरू नहीं होने देतीं जब शिकायत अपने वर्तमान स्वरूप में कोई अपराध नहीं दिखाती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह फैसला सिर्फ इस कानूनी सवाल तक सीमित है कि क्या शिकायत धारा 285 और 352 के तत्व दिखाती है — इसका याचिकाकर्ता के कथित बयान की विषय-वस्तु या औचित्य से कोई संबंध नहीं है। यानी कोर्ट का विश्लेषण अपराध के ढांचे पर है, न कि कथित तौर पर कही गई बात की राजनीति पर।
केस का ब्योरा
- केस शीर्षक: इम्तियाज़ नुरुद्दीन चिंचली बनाम कर्नाटक राज्य व अन्य
- क्रिमिनल पिटीशन नंबर: 101720/2026
- पीठ: न्यायमूर्ति वेंकटेश नाइक टी., कर्नाटक हाईकोर्ट, धारवाड़ बेंच
- तटस्थ उद्धरण (Neutral Citation): 2026:KHC-D:15574
- आदेश की तारीख: 18 सितंबर 2026
- नतीजा: क्रिमिनल पिटीशन स्वीकार; धारा 285 और 352 BNS के तहत FIR व कार्यवाही रद्द
निष्कर्ष
यह फैसला याद दिलाता है कि धारा 352 BNS किसी तीसरे पक्ष से जुड़ी टिप्पणी पर हुई नाराज़गी का सामान्य उपाय नहीं है, बल्कि यह एक खास अपराध है जिसमें शिकायतकर्ता के प्रति जानबूझकर किए गए अपमान और शांति भंग भड़काने के इरादे की जरूरत होती है। कर्नाटक हाईकोर्ट का यह आदेश आपराधिक कानून के दुरुपयोग को रोकने की न्यायपालिका की प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है, खासकर उन मामलों में जहां शिकायत के मूल तथ्य ही अपराध का गठन नहीं करते।




