22 किलो गांजा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दी जमानत, सिर्फ ट्रायल में देरी बनी वजह
मामला क्या है
सुप्रीम कोर्ट ने राजदुरई बनाम तमिलनाडु राज्य [SLP(Crl.) No. 4729/2026] मामले में एक बड़ा फैसला सुनाते हुए लगभग 22.95 किलोग्राम गांजा रखने के आरोपी व्यक्ति को नियमित जमानत दे दी। यह मामला नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटांसेज एक्ट, 1985 (NDPS Act) की धारा 8(c), 20(b)(ii)(c) और 29(1) के तहत दर्ज किया गया था। चूंकि बरामद मात्रा “कमर्शियल क्वांटिटी” (व्यावसायिक मात्रा) की श्रेणी में आती है, इसलिए मद्रास हाईकोर्ट ने पहले आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच और फैसले की तारीख
5 मई 2026 को जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। कोर्ट को बताया गया कि आरोपी को गिरफ्तार हुए एक साल से अधिक समय हो चुका है, और भले ही ट्रायल कोर्ट ने आरोप तय कर दिए हों, लेकिन अब तक एक भी गवाह का बयान दर्ज नहीं हुआ है। इस स्थिति को देखते हुए बेंच ने अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करते हुए आरोपी के पक्ष में फैसला सुनाया और उसे जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया, जिसकी शर्तें ट्रायल कोर्ट तय करेगी।
धारा 37 एनडीपीएस एक्ट क्यों है अहम
एनडीपीएस एक्ट की धारा 37 व्यावसायिक मात्रा से जुड़े मामलों में जमानत देने की शर्तों को बेहद सख्त बनाती है। इस धारा के तहत कोर्ट को दो शर्तों पर संतुष्ट होना जरूरी है:
- यह मानने के लिए उचित आधार हों कि आरोपी दोषी नहीं है
- आरोपी के जमानत पर रहते हुए दोबारा अपराध करने की आशंका न हो
आमतौर पर इन दोनों शर्तों को पूरा करना कठिन होता है, यही वजह है कि व्यावसायिक मात्रा के मामलों में जमानत मिलना दुर्लभ माना जाता है। इसीलिए इस फैसले को खास माना जा रहा है, क्योंकि कोर्ट ने इन शर्तों की औपचारिक चर्चा के बजाय मुख्य रूप से ट्रायल में हो रही देरी और आरोपी की लंबी हिरासत को आधार बनाया।

स्पीडी ट्रायल का अधिकार बना निर्णायक कारण
कोर्ट ने अपने आदेश में यह स्पष्ट संकेत दिया कि आरोपी के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले शीघ्र सुनवाई (स्पीडी ट्रायल) के अधिकार की अनदेखी नहीं की जा सकती, खासकर तब जब लंबे समय तक हिरासत में रहने के बावजूद अभियोजन पक्ष एक भी गवाह पेश नहीं कर पाया हो। कोर्ट ने अपने आदेश में मामले की परिस्थितियों को देखते हुए आरोपी के पक्ष में विवेकाधिकार अपनाने की बात दर्ज की।
हाल के परस्पर-विरोधी फैसले से तुलना
यह उल्लेखनीय है कि इससे कुछ समय पहले ही जस्टिस संजय करोल की बेंच ने स्टेट ऑफ पंजाब बनाम सुखविंदर सिंह उर्फ गोरा [2026 LiveLaw (SC) 421] मामले में ठीक इसके उलट रुख अपनाया था। उस मामले में पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने केवल ट्रायल में देरी के आधार पर आरोपी को जमानत दी थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया। उस फैसले में कोर्ट ने कहा था कि अनुच्छेद 21 के तहत शीघ्र सुनवाई का अधिकार, एनडीपीएस एक्ट की धारा 37 की सख्त वैधानिक शर्तों को दरकिनार नहीं कर सकता, खासकर व्यावसायिक मात्रा से जुड़े मामलों में।
इस विरोधाभास से साफ होता है कि एनडीपीएस मामलों में जमानत का फैसला हर बेंच के समक्ष रखे गए तथ्यों, हिरासत की अवधि, और ट्रायल की वास्तविक स्थिति पर निर्भर करता है — यानी यह एक तय फॉर्मूला नहीं, बल्कि केस-दर-केस विवेकाधिकार का मामला बना हुआ है।
केस की मुख्य जानकारी एक नज़र में
- केस टाइटल: राजदुरई बनाम तमिलनाडु राज्य
- साइटेशन: 2026 LiveLaw (SC) 462
- बेंच: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला, जस्टिस के.वी. विश्वनाथन
- फैसले की तारीख: 5 मई 2026
- बरामद मात्रा: लगभग 22.95 किलोग्राम गांजा (व्यावसायिक मात्रा)
- हिरासत अवधि: एक साल से अधिक
- याचिकाकर्ता के वकील: नरेंदर कुमार वर्मा (AOR), महिमाई एंटोनी जेयम, लेनिन के, अब्बास, ए. लक्ष्मीनारायणन (AOR), यू. कथिरवन
- प्रतिवादी की ओर से: सबरीश सुब्रमण्यन (AOR)
इस फैसले का व्यापक असर
कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला निचली अदालतों और अभियोजन एजेंसियों के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है — अगर जांच और ट्रायल की प्रक्रिया में देरी होती है और आरोपी बरसों जेल में बंद रहता है, तो अदालतें सख्त वैधानिक प्रावधानों के बावजूद भी संवैधानिक अधिकारों को प्राथमिकता दे सकती हैं। हालांकि, चूंकि सुखविंदर सिंह मामले में कोर्ट ने विपरीत रुख अपनाया था, इसलिए यह तय सिद्धांत नहीं बल्कि तथ्यों पर आधारित विवेकाधिकार का उदाहरण है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि निचली अदालतें और हाईकोर्ट एनडीपीएस मामलों में जमानत तय करते समय इन दोनों नजीरों के बीच किस तरह संतुलन बनाती हैं।




