POCSO केस झेल रहे पिता को कस्टडी नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने माँ को दोनों बच्चों के साथ UK जाने दिया

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POCSO मुकदमे का सामना कर रहे माता-पिता को नहीं मिल सकती बच्चों की कस्टडी: सुप्रीम कोर्ट ने माँ को बच्चों के साथ UK जाने की दी अनुमति

क्या है पूरा मामला?

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 23 सितंबर को एक अहम फैसला सुनाया। बच्चों की कस्टडी के एक विवाद में कोर्ट ने कहा कि जिस माता या पिता पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़े POCSO कानून के तहत मुकदमा चल रहा हो, उसे बच्चों की कस्टडी का हकदार नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर कोर्ट ने एक माँ को अपने दोनों नाबालिग बच्चों के साथ यूनाइटेड किंगडम (UK) जाने की इजाज़त दे दी।

फैसला जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने दिया। इसे जस्टिस मेहता ने लिखा। केस का शीर्षक “D बनाम S” है।

विवाद की पृष्ठभूमि: शादी से कस्टडी की लड़ाई तक

दोनों पक्षों का विवाह सितंबर 2011 में हुआ था। अप्रैल 2013 में बेटे का जन्म हुआ और जनवरी 2019 में बेटी का।

माँ ने 2018 में ससुराल छोड़ दिया था, तब वे चार महीने की गर्भवती थीं। इसके बाद नौकरी की तलाश में वे देश के अलग-अलग शहरों में रहीं। आख़िरकार उन्हें UK की यूनिवर्सिटी ऑफ़ हल में लेक्चरर की नौकरी मिली।

फैमिली कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट का रुख

फैमिली कोर्ट और बाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने माँ के बार-बार ठिकाना बदलने को अस्थिर, यानी “खानाबदोश” जीवनशैली का संकेत माना। इसी आधार पर दोनों बच्चों की कस्टडी पिता को दे दी गई। इस फैसले से असंतुष्ट होकर माँ सुप्रीम कोर्ट पहुँचीं।

POCSO FIR कैसे दर्ज हुई?

सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड पर गौर किया कि 2023 में बेटे के व्यवहार में आक्रामकता दिखी थी। इसके बाद उसे NIMHANS ले जाया गया। वहाँ जाँच के दौरान बेटे ने पिता द्वारा यौन शोषण की बात बताई।

इसके बाद पुलिस में शिकायत हुई और पिता के खिलाफ POCSO के तहत FIR दर्ज की गई। मामले में चार्जशीट दाखिल हो चुकी है। FIR रद्द कराने की पिता की याचिका कलकत्ता हाईकोर्ट में लंबित है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

पीठ ने साफ़ कहा कि जब पिता के खिलाफ POCSO के तहत आरोपों में चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, तब बच्चों की कस्टडी उन्हें सौंपना पूरी तरह अनुचित होगा। कोर्ट के मुताबिक, जब तक मुकदमा चल रहा है, पिता को कस्टडी का हकदार व्यक्ति नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने इसके पीछे दो बड़े कारण बताए:

  • कानून के उद्देश्य के खिलाफ: ऐसा आदेश जुवेनाइल जस्टिस कानून के मूल मकसद के विपरीत होता।
  • मुकदमे पर असर: अगर बेटा उसी व्यक्ति की कस्टडी में रहता जिस पर आरोप है, तो उसके खुलकर और निष्पक्ष ढंग से गवाही देने की संभावना बहुत कम हो जाती। इससे पूरी कानूनी कार्यवाही बेअसर हो सकती थी।

कोर्ट ने यह भी कहा कि आपराधिक मामला लंबित रहते हुए बेटे की गवाही और सुरक्षा को पिता के कस्टडी के दावे से कमतर नहीं आँका जा सकता।

जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2015 की धारा 3 की भूमिका

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के नज़रिए से असहमति जताते हुए जुवेनाइल जस्टिस (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) एक्ट, 2015 की धारा 3 के सिद्धांतों का सहारा लिया। इस धारा में बच्चों से जुड़े मामलों के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत दिए गए हैं। कोर्ट ने इनमें से खास तौर पर इन पर ज़ोर दिया:

  • भागीदारी: बच्चे की बात सुनी जानी चाहिए।
  • सर्वोत्तम हित: हर फैसले में बच्चे का हित सबसे ऊपर हो।
  • सुरक्षा: बच्चे को किसी भी तरह के नुकसान से बचाना।
  • अधिकारों का त्याग न होना (non-waiver): बच्चे के अधिकार किसी परिस्थिति में छोड़े या नज़रअंदाज़ नहीं किए जा सकते।

यह फैसला क्यों अहम है?

पहला, कस्टडी के मामलों में अक्सर माता-पिता की आर्थिक और जीवनशैली की स्थिरता पर ज़्यादा ज़ोर दिया जाता है। यह फैसला याद दिलाता है कि बच्चे की सुरक्षा और मानसिक सुरक्षा इन सबसे ऊपर है।

दूसरा, यह आपराधिक मुकदमे की निष्पक्षता से भी जुड़ा है। जब पीड़ित बच्चा आरोपी के साथ रह रहा हो, तो दबाव या डर की आशंका रहती है। ऐसे में स्वतंत्र गवाही मुश्किल हो सकती है।

तीसरा, माँ के बार-बार शहर बदलने को कमज़ोरी मानने वाले नज़रिए को सुप्रीम कोर्ट ने नहीं माना। कोर्ट ने पूरी तस्वीर देखकर बच्चों के हित को प्राथमिकता दी।

ध्यान देने वाली बात

यह फैसला कस्टडी के सवाल पर है, आरोपों की सच्चाई पर नहीं। पिता के खिलाफ POCSO का मुकदमा अभी लंबित है। आरोप साबित हुए हैं या नहीं, यह फैसला ट्रायल कोर्ट करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ यह कहा कि इस दौरान बच्चों की सुरक्षा और मुकदमे की निष्पक्षता को देखते हुए कस्टडी पिता को नहीं दी जा सकती।

आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों को जनवरी 2027 में आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है।

निष्कर्ष

यह फैसला बच्चों से जुड़े मामलों में एक साफ़ संदेश देता है कि कानूनी लड़ाई में बच्चे का हित, उसकी सुरक्षा और उसकी बात सबसे ऊपर होती है। POCSO जैसे गंभीर कानून के तहत मुकदमा झेल रहे माता-पिता में से किसी को भी कस्टडी देने से पहले अदालतों को इन सिद्धांतों की कसौटी पर परखना होगा।

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