मामला क्या है
करीब दो दशक पुराना सोहराबुद्दीन शेख फर्जी एनकाउंटर केस एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर है। सोमवार को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की तीन-जजों की बेंच ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए साफ किया कि वह इस केस के 22 आरोपियों की बरी होने की स्थिति की समीक्षा तो करेगी, लेकिन पूरा मामला दोबारा नहीं खोलेगी।
यह याचिका सोहराबुद्दीन शेख के छोटे भाई रुबाबुद्दीन शेख और नयाबुद्दीन शेख ने दाखिल की है, जिसमें बॉम्बे हाई कोर्ट के 7 मई 2026 के उस फैसले को चुनौती दी गई है जिसमें दिसंबर 2018 में विशेष सीबीआई अदालत द्वारा सभी 22 आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखा गया था। इन 22 आरोपियों में से 21 गुजरात, राजस्थान और आंध्र प्रदेश पुलिस के अधिकारी हैं।
कोर्ट ने क्या आदेश दिया
सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई और सभी 22 बरी हुए आरोपियों को नोटिस जारी कर उनका जवाब मांगा है। लेकिन साथ ही बेंच ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि वह हाई कोर्ट के फैसले के पैराग्राफ 43 पर पुनर्विचार नहीं करेगी — यह वही हिस्सा है जो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के 2014 में हुए डिस्चार्ज (आरोपमुक्ति) से जुड़ा है और जो अब अंतिम रूप ले चुका है।
जस्टिस बागची ने सुनवाई के दौरान कहा कि पैराग्राफ 43 को चुनौती नहीं दी जा सकती और जो डिस्चार्ज अंतिम रूप ले चुका है, उसे दोबारा नहीं खोला जाएगा। CJI सूर्य कांत ने इस बात से सहमति जताई और कहा कि अदालत सिर्फ यह देखना चाहती है कि जिन लोगों पर मुकदमा चला, उन्हें निष्पक्ष और उचित ट्रायल मिला या नहीं।
210 में से 92 गवाह मुकरे — कोर्ट ने जताई चिंता
सुनवाई के दौरान बेंच ने इस बात पर गंभीर चिंता जताई कि ट्रायल के दौरान कुल 210 गवाहों में से 92 गवाह अपने बयान से मुकर गए थे। जस्टिस बागची ने इसे “गंभीर चिंता का विषय” बताते हुए कहा कि इतनी बड़ी संख्या में गवाहों का पलटना सवाल खड़े करता है, भले ही निचली अदालत और हाई कोर्ट दोनों ने एक जैसा फैसला दिया हो।
कोर्ट ने पूरा ट्रायल रिकॉर्ड तलब करने से इनकार करते हुए याचिकाकर्ता के वकील से कहा कि वे जो भी 3-4 अहम गवाहों के बयान जरूरी समझें, वे अदालत के सामने पेश करें। CJI सूर्य कांत ने कहा कि अदालत पूरा रिकॉर्ड नहीं मंगा रही, बल्कि चुनिंदा अहम बयानों के आधार पर बरी होने के फैसले की समीक्षा करेगी।
केस की पृष्ठभूमि
यह मामला नवंबर 2005 का है, जब सोहराबुद्दीन शेख, उनकी पत्नी कौसर बी और उनके सहयोगी तुलसीराम प्रजापति को हैदराबाद से सांगली जाते वक्त एक बस से पुलिस टीम ने हिरासत में लिया था। आरोप है कि 26 नवंबर 2005 को गुजरात और राजस्थान पुलिस की संयुक्त टीम ने सोहराबुद्दीन की फर्जी मुठभेड़ में हत्या कर दी। कुछ दिनों बाद कौसर बी की भी कथित तौर पर हत्या कर उनका शव जला दिया गया। एकमात्र चश्मदीद गवाह माने जाने वाले तुलसीराम प्रजापति को दिसंबर 2006 में गुजरात-राजस्थान सीमा पर एक और कथित फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया।
शुरुआत में यह मामला गुजरात CID के पास था, लेकिन सोहराबुद्दीन के परिवार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 2010 में जांच सीबीआई को सौंप दी और 2012 में ट्रायल मुंबई की विशेष अदालत में स्थानांतरित कर दिया गया। दिसंबर 2018 में विशेष सीबीआई अदालत ने यह कहते हुए सभी 22 आरोपियों को बरी कर दिया कि अभियोजन पक्ष साजिश साबित करने में नाकाम रहा। सीबीआई ने भी इस फैसले के खिलाफ अपील न करने का फैसला किया था।

अमित शाह का जुड़ाव और चर्चित जज लोया एंगल
इस केस ने तब राष्ट्रीय सुर्खियां बटोरी थीं जब जुलाई 2010 में सीबीआई ने तत्कालीन गुजरात गृह मंत्री अमित शाह समेत 38 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। शाह को 2014 में विशेष सीबीआई अदालत ने आरोपमुक्त कर दिया था, और यह फैसला बाद में अंतिम रूप ले चुका है। इस केस की सुनवाई कर रहे विशेष जज बीएच लोया की नवंबर 2014 में हुई मौत को लेकर भी विवाद खड़ा हुआ था, जिसमें स्वतंत्र जांच की मांग वाली याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट पहले ही खारिज कर चुका है।
आगे क्या होगा
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई और सभी बरी हुए आरोपियों से जवाब मांगा है। अगली सुनवाई में बेंच चुनिंदा गवाहों के बयानों की समीक्षा कर यह तय करेगी कि ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट का फैसला बरकरार रखा जाए या नहीं। यह देखना अहम होगा कि क्या अदालत मौजूदा बरी होने के आदेश में कोई बदलाव करती है, हालांकि उसने यह साफ कर दिया है कि अमित शाह से जुड़ा हिस्सा इस समीक्षा से पूरी तरह बाहर रहेगा।




