उत्तर प्रदेश में हुक्का बार चलाने वाले रेस्टोरेंट मालिकों को इलाहाबाद हाईकोर्ट से एक बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि प्रदेश के किसी भी रेस्टोरेंट में हुक्का बार चलाना या हुक्का सर्विस देना पूरी तरह गैरकानूनी है, क्योंकि यह सिगरेट व अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम यानी COTPA का सीधा उल्लंघन है। यह फैसला अफ्टेक फूड्स एंड बेवरेजेज प्राइवेट लिमिटेड और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में 81 याचिकाओं के एक बड़े समूह पर सुनाया गया।
मामला क्या था?
प्रदेश भर के कई रेस्टोरेंट मालिक अपने हुक्का बार कारोबार में पुलिस के लगातार दखल से परेशान होकर हाईकोर्ट पहुंचे थे। उनकी दलील थी कि पुलिस बेवजह उनके व्यवसाय में हस्तक्षेप कर रही है। जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की डिवीजन बेंच ने इन सभी याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए यह अहम फैसला सुनाया।
कोर्ट ने क्या कहा — कानूनी आधार
बेंच ने अपने फैसले में कहा कि उत्तर प्रदेश में रेस्टोरेंट द्वारा हुक्का बार चलाना ‘सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान निषेध नियम, 2008’ के नियम 4(3) का उल्लंघन है, जिसे 2017 में संशोधित किया गया था। कोर्ट के अनुसार, यह संशोधन स्मोकिंग के लिए तय जगहों पर हर तरह की सर्विस — चाहे वह खाना हो, ड्रिंक्स हों, तंबाकू उत्पाद हों या हुक्का — पर पूरी तरह रोक लगाता है, और इसमें कोई छूट नहीं दी गई है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि निर्धारित स्मोकिंग एरिया (Designated Smoking Area) की व्यवस्था धूम्रपान पर रोक के सामान्य नियम का एक अपवाद भर है, इसलिए इसे संकीर्ण और सख्त अर्थ में पढ़ा जाना चाहिए, ताकि यह COTPA के मूल मकसद — यानी धूम्रपान की रोकथाम और सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा — को कमजोर न करे।
किसके पास है नियमन का अधिकार?
फैसले में एक अहम बात यह भी स्पष्ट की गई कि फूड सेफ्टी डिपार्टमेंट या म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के पास रेस्टोरेंट में हुक्का बार खोलने या उसे चलाने की इजाजत देने का कोई अधिकार नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने पुलिस के अधिकार को बरकरार रखते हुए कहा कि COTPA के नियमों का उल्लंघन होने पर पुलिस ऐसे परिसरों की तलाशी ले सकती है, सामान जब्त कर सकती है और जुर्माना लगा सकती है।
अनुच्छेद 21 बनाम अनुच्छेद 19(1)(g) — मौलिक अधिकारों की लड़ाई
इस फैसले की सबसे दिलचस्प बात यह है कि कोर्ट ने इसे सीधे मौलिक अधिकारों के दायरे में रखकर देखा। बेंच ने कहा कि सार्वजनिक स्थान पर धूम्रपान न करने वाले व्यक्ति का साफ हवा में सांस लेने का अधिकार, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है। इस अधिकार को किसी व्यावसायिक संस्थान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत व्यापार करने के अधिकार के आधार पर कमजोर नहीं किया जा सकता। यानी कोर्ट ने साफ संदेश दिया कि नागरिकों की सेहत का अधिकार, कारोबारी हितों से ऊपर है।
“हुक्का कम नुकसानदायक है” — कोर्ट ने खारिज की यह धारणा
अक्सर यह माना जाता है कि हुक्का सिगरेट के मुकाबले कम हानिकारक है। कोर्ट ने इस आम धारणा को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि हुक्का भी सिगरेट जितना ही नशे की लत लगाने वाला और नुकसानदायक है, और इसमें भी उतने ही जहरीले रसायन पाए जाते हैं। बेंच ने यह भी रेखांकित किया कि जहां सिगरेट के हर पैकेट पर कानूनन स्वास्थ्य चेतावनी छापना अनिवार्य है, वहीं हुक्के के मामले में ऐसा कोई स्पष्ट नियामक ढांचा मौजूद नहीं है — और यह एक ऐसी नियामक कमी है, जिस पर तुरंत कानूनी ध्यान दिए जाने की जरूरत है।
स्टाफ की सुरक्षा भी एक वजह
कोर्ट ने यह भी बताया कि स्मोकिंग एरिया में किसी भी तरह की “सेवा न देने” के नियम के पीछे मकसद सिर्फ ग्राहकों की सेहत नहीं, बल्कि वहां काम करने वाले धूम्रपान न करने वाले कर्मचारियों और वेटिंग स्टाफ को दूसरे हाथ के धुएं (passive smoking) से बचाना भी है। कोर्ट ने इस तर्क को भी नकार दिया कि तय स्मोकिंग एरिया में हुक्का पीना, वहां सिगरेट पीने जैसा ही माना जा सकता है।
सरकार के लिए आगे क्या निर्देश?
कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वह इस रोक को सख्ती से लागू करने के लिए हर जरूरी कदम उठाए। इसमें यह भी शामिल है कि सरकार एक औपचारिक नोटिफिकेशन जारी करे, जिसके तहत तय स्मोकिंग एरिया में हुक्का सर्विस देने पर कड़ी सजा का प्रावधान हो। मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता हर्षित सिंह और राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता पंकज खरे ने पैरवी की।
रेस्टोरेंट कारोबारियों के लिए इसका क्या मतलब है?
- राज्य भर के रेस्टोरेंट अब हुक्का बार के रूप में लाइसेंस या “स्मोकिंग जोन” का हवाला देकर हुक्का सर्विस नहीं दे सकते।
- फूड सेफ्टी विभाग या नगर निगम से मिला कोई भी लाइसेंस अब हुक्का बार चलाने का आधार नहीं बन सकता।
- नियम तोड़ने पर पुलिस सीधे कार्रवाई कर सकती है — तलाशी, जब्ती और जुर्माना, तीनों संभव हैं।
- सरकार जल्द ही सख्त दंड वाला नोटिफिकेशन ला सकती है, जिससे उल्लंघन पर जुर्माना और भारी हो सकता है।
निष्कर्ष
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला सिर्फ एक व्यावसायिक विवाद का निपटारा नहीं है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और नागरिकों के मौलिक अधिकारों को लेकर एक स्पष्ट कानूनी संदेश है। कोर्ट ने यह भी दिखा दिया है कि “स्मोकिंग एरिया” जैसे अपवादों की आड़ में कारोबार को नियमों से बचने की इजाजत नहीं दी जा सकती। अब देखना यह होगा कि उत्तर प्रदेश सरकार इस आदेश को जमीनी स्तर पर कितनी सख्ती से लागू कर पाती है, और क्या यह फैसला दूसरे राज्यों में भी हुक्का बार को लेकर कानूनी बहस छेड़ता है।




