धारा 69 BNS पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: नीयत सही हो तो शादी का वादा टूटना अपराध नहीं

Date:

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा स्पष्टीकरण: BNS की धारा 69 के तहत हर टूटा वादा ‘धोखे से सेक्स’ नहीं माना जा सकता

मामले का सार एक नज़र में

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 को लेकर एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने साफ किया कि शादी का सच्चा और नेकनीयती से किया गया वादा अगर बाद में पारिवारिक कारणों से टूट जाए, तो उसे धोखे से लिया गया सहमति-संबंध (deceitful sex) नहीं कहा जा सकता। इसी आधार पर कोर्ट ने वडोदरा की सयाजीगंज पुलिस स्टेशन में दर्ज एक FIR रद्द कर दी।

पूरा मामला क्या था

यह मामला कुणाल रमेशभाई कल्याणी बनाम गुजरात राज्य से जुड़ा है। शिकायतकर्ता और याचिकाकर्ता की मुलाकात एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हुई थी, जो दोस्ती से होते हुए प्रेम संबंध में बदल गई। आरोप के मुताबिक पहली मुलाकात में ही याचिकाकर्ता ने शादी की इच्छा जताई और फरवरी 2024 में शारीरिक संबंध बना। दोनों अप्रैल 2024 में दो दिन एक होटल में भी साथ रुके। बाद में याचिकाकर्ता ने अपनी मां की असहमति का हवाला देकर शादी से इनकार कर दिया, जिसके बाद धारा 69 BNS के तहत FIR दर्ज हुई।

गुजरात हाईकोर्ट ने दीपक गुलाटी बनाम हरियाणा राज्य मामले का हवाला देते हुए FIR रद्द करने से इनकार कर दिया था। इसी आदेश को चुनौती देते हुए मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

दीपक गुलाटी सिद्धांत और उसकी सीमा

सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि दीपक गुलाटी मामले में कहा गया था कि अभियुक्त पर तभी आपराधिक ज़िम्मेदारी डाली जा सकती है जब यह साबित हो कि शुरुआत से ही उसका वादा निभाने का इरादा नहीं था। भविष्य की किसी अनिश्चित तारीख पर किया गया वादा अगर बाद में पूरा न हो सके, तो यह ज़रूरी नहीं कि वह “तथ्य की गलतफहमी” (misconception of fact) की श्रेणी में आए। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि जब दीपक गुलाटी का फैसला आया था, तब IPC में धारा 69 BNS जैसा कोई अलग प्रावधान मौजूद ही नहीं था।

Supreme Court of India building with Bharatiya Nyaya Sanhita Section 69 text overlay on false marriage promise case

धारा 69 BNS पहले से कैसे अलग है

बेंच ने स्पष्ट किया कि पुराने कानून (IPC) में शादी के झूठे वादे के मामलों में धारा 375 (बलात्कार) और धारा 90 (गलतफहमी में दी गई सहमति) दोनों को साथ पढ़ना पड़ता था। लेकिन BNS ने धारा 69 लाकर धोखाधड़ी वाले व्यवहार को बलात्कार जैसे गंभीर अपराध से अलग कर एक स्वतंत्र अपराध का रूप दे दिया है। कोर्ट के अनुसार इस धारा का ज़ोर इस बात पर है कि वादा करते समय ही उसे पूरा करने की नीयत नहीं होनी चाहिए — तभी यह दंडनीय धोखा माना जाएगा।

कोर्ट ने तथ्यों में धोखा क्यों नहीं पाया

FIR का बारीकी से अवलोकन करने के बाद बेंच ने पाया कि शिकायत में दिया गया विवरण एक आपसी सहमति से बने रिश्ते की तस्वीर पेश करता है, न कि छल-कपट से बहलाए जाने की। अदालत ने यह भी चिह्नित किया कि शिकायत में यह आरोप कहीं नहीं है कि पहली बार का शारीरिक संबंध शादी के वादे की शर्त पर बना था। इसके अलावा, याचिकाकर्ता का बाद में शादी की इच्छा जताना और अंततः मां की अनुमति न मिलने के कारण इनकार करना, कोर्ट की नज़र में यही दिखाता है कि अगर वादा किया भी गया था तो वह नेकनीयती से किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला

इन तथ्यों के आधार पर कोर्ट ने पाया कि आगे मुकदमा चलाने का कोई आधार नहीं बनता। नतीजतन सुप्रीम कोर्ट ने वडोदरा के सयाजीगंज पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR नंबर 11196030250292 (दिनांक 20.05.2025) को रद्द कर दिया और याचिकाकर्ता के खिलाफ सारी कार्यवाही समाप्त कर दी।

इस फैसले का व्यापक कानूनी महत्व

यह फैसला आने वाले समय में निचली अदालतों और पुलिस जांच के लिए एक अहम कसौटी बन सकता है। यह स्पष्ट करता है कि धारा 69 BNS को यांत्रिक ढंग से लागू नहीं किया जा सकता — हर टूटे रिश्ते या हर बदले हुए फैसले को अपराध की श्रेणी में डालना गलत होगा। अभियोजन पक्ष को यह साबित करना ही होगा कि वादा शुरुआत से ही झूठा और स्वार्थपूर्ण इरादे से किया गया था, न कि किसी वास्तविक पारिवारिक या परिस्थितिजन्य कारण से टूटा।

Case: Kunal Rameshbhai Kalyani v State of Gujarat & Anr.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_img
spot_img
spot_img
spot_img

Popular

More like this
Related

क्या AI कॉर्पोरेट वकीलों की जगह ले सकता है?

कुछ साल पहले तक कॉर्पोरेट लॉ फ़र्म का एक...

सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस: सुप्रीम कोर्ट बरी होने पर करेगा सुनवाई, केस दोबारा नहीं खोलेगा

मामला क्या है करीब दो दशक पुराना सोहराबुद्दीन शेख फर्जी...