नशीले पदार्थों से जुड़े मामलों में पुलिस अक्सर वाहन को ज़ब्त कर लेती है, लेकिन बरसों बाद भी वह वाहन थाने या यार्ड में खड़ा-खड़ा जंग खा जाता है। मालिक अदालतों के चक्कर काटता रहता है और यह साफ़ नहीं होता कि आख़िर गाड़ी छोड़ने या नष्ट करने का फ़ैसला कौन करेगा — जांच एजेंसी, ड्रग डिस्पोज़ल कमिटी या अदालत। सुप्रीम कोर्ट ने अब इस उलझन को सुलझाते हुए साफ़ कर दिया है कि NDPS एक्ट, 1985 के तहत ज़ब्त वाहन को डिस्पोज़ करने का अंतिम अधिकार सिर्फ़ उस ट्रायल कोर्ट के पास है, जो एक्ट की धारा 63 के तहत मामले की सुनवाई कर रही है। धारा 52A के तहत गठित ड्रग डिस्पोज़ल कमिटी (DDC) कोर्ट के आदेश के बिना खुद से यह प्रक्रिया शुरू नहीं कर सकती।
यह फ़ैसला जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने आर मणिमरन बनाम तमिलनाडु राज्य मामले में सुनाया।
क्या था पूरा मामला?
यह विवाद तमिलनाडु के पुदुकोट्टई ज़िले से जुड़ा है। याचिकाकर्ता की एक लॉरी को रोककर तलाशी ली गई, जिसमें कथित तौर पर करीब 66 किलो गांजा बरामद हुआ। इसके बाद NDPS एक्ट के तहत चार लोगों के खिलाफ़ मुकदमा दर्ज किया गया और लॉरी को ज़ब्त कर लिया गया।
सालों तक चली सुनवाई के बाद एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस कोर्ट (आर्थिक अपराध और NDPS मामले, पुदुकोट्टई) ने सभी चारों आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने बरी करने के पीछे कई गंभीर खामियां गिनाईं:
- गिरफ़्तारी मेमो में अनियमितताएं
- ज़ब्त सामान को सुरक्षित रखे जाने का कोई रिकॉर्ड न होना
- महामारी (लॉकडाउन) के दौरान लॉरी को सड़क पर चलाने की इजाज़त किसने और कैसे दी, इसका जवाब अभियोजन पक्ष के पास न होना
- सैंपल को कोर्ट और लैब भेजने में हुई देरी
आरोपियों को बरी करते हुए ट्रायल कोर्ट ने यह भी आदेश दिया था कि अपील की समयसीमा खत्म होने के बाद लॉरी उसके मालिक को लौटा दी जाए।
ट्रायल कोर्ट में अर्ज़ी खारिज, हाईकोर्ट ने भी दिया झटका
जब अपील की अवधि बीत गई और याचिकाकर्ता लॉरी वापस लेने ट्रायल कोर्ट पहुंचा, तो उसकी अर्ज़ी खारिज कर दी गई। दरअसल, जांच अधिकारी ने पहले ही अलग से एक आवेदन देकर गाड़ी को ड्रग डिस्पोज़ल कमिटी (DDC) के पास भेजने की मांग कर दी थी।
मामला मद्रास हाईकोर्ट पहुंचा, जिसने ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले को सही ठहराया। हाईकोर्ट ने धारा 52A, संबंधित स्टैंडिंग ऑर्डर्स और NDPS (ज़ब्ती, भंडारण, सैंपलिंग और डिस्पोज़ल) नियम, 2022 का हवाला दिया। हाईकोर्ट ने अपने पहले के फ़ैसले, नहुरकानी बनाम राज्य, पर भरोसा जताया, जिसमें कहा गया था कि:
- धारा 63 के तहत कार्यवाही ट्रायल के दौरान ही होनी चाहिए, ट्रायल खत्म होने के बाद नहीं
- गाड़ियों को ज़ब्त करने का राज्य का अधिकार मुकदमे के नतीजे (बरी होना या दोषी ठहराया जाना) से पूरी तरह स्वतंत्र होता है
- एक बार यह चरण बीत जाने के बाद, ज़ब्त वाहनों पर अदालतों का अधिकार क्षेत्र खत्म हो जाता है
हाईकोर्ट के इस रुख से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला: अधिकार सिर्फ़ ट्रायल कोर्ट के पास
सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले की बारीकी से समीक्षा करते हुए हाईकोर्ट के रुख को पलट दिया। कोर्ट ने कहा कि कानून के तहत ज़ब्ती को लेकर अंतिम फ़ैसला लेने का अधिकार उसी अदालत के पास सुरक्षित है, जो मामले की सुनवाई कर रही है — यानी NDPS एक्ट की धारा 63 के तहत ट्रायल कोर्ट। इसका मतलब यह है कि ड्रग डिस्पोज़ल कमिटी को दिया गया प्रशासनिक अधिकार, कोर्ट की न्यायिक शक्ति की जगह नहीं ले सकता।
इस निष्कर्ष के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि विवादित लॉरी को उसके मालिक (याचिकाकर्ता) को सौंप दिया जाए।
इस फ़ैसले का कानूनी महत्व क्यों है?
यह फ़ैसला सिर्फ़ एक लॉरी की वापसी का मामला भर नहीं है — यह NDPS एक्ट के तहत ज़ब्त संपत्तियों के प्रबंधन को लेकर एक ज़रूरी सैद्धांतिक स्पष्टता देता है।
- न्यायिक निगरानी बरकरार — DDC जैसी प्रशासनिक कमिटी, चाहे वह धारा 52A के तहत कितनी भी सक्रिय क्यों न हो, ट्रायल कोर्ट के आदेश की जगह नहीं ले सकती।
- आरोपी के अधिकारों की सुरक्षा — जब आरोपी को अदालत बरी कर देती है, तो उसकी ज़ब्त संपत्ति पर उसका दावा फिर से मज़बूत हो जाता है, बशर्ते ट्रायल कोर्ट ने उसे लौटाने का आदेश पहले ही दे दिया हो।
- प्रक्रिया में स्पष्टता — जांच एजेंसियां अब सीधे DDC के पास वाहन भेजने के बजाय पहले ट्रायल कोर्ट से अनुमति लेने के लिए बाध्य होंगी।
- लंबित मामलों पर असर — देशभर की निचली अदालतों और हाईकोर्ट में लंबित ऐसे ही सैकड़ों मामलों में यह फ़ैसला एक मिसाल के तौर पर काम करेगा।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह फ़ैसला NDPS एक्ट के तहत ज़ब्त वाहनों को लेकर बरसों से चली आ रही अस्पष्टता को दूर करता है। कोर्ट ने साफ़ संदेश दिया है कि प्रशासनिक कमिटी, चाहे वह कितनी भी ज़रूरी क्यों न हो, न्यायिक प्रक्रिया और ट्रायल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को दरकिनार नहीं कर सकती। आम नागरिकों के लिए यह फ़ैसला उम्मीद की एक किरण है — खासकर उन लोगों के लिए जो सालों तक मुकदमे लड़ने के बावजूद बरी होने पर भी अपनी ज़ब्त गाड़ी वापस पाने के लिए भटकते रहते हैं।
केस का नाम: आर मणिमरन बनाम तमिलनाडु राज्य (R Manimaran v. State of Tamil Nadu)





