रेजी बेबी बनाम सुबी मैरी: जब पत्नी ने समझौते में भरण-पोषण माफ किया, तो सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत दावा क्यों खारिज किया
पैंतीस साल से अदालतों की कार्यवाही देखते-देखते एक बात बार-बार सामने आती है — पारिवारिक कानून के मामलों में सबसे ज्यादा टकराव तब होता है जब एक समझौता “अंतिम” माना जाए या नहीं। 24 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने ठीक इसी सवाल का जवाब दिया। रेजी बेबी बनाम सुबी मैरी एवं अन्य मामले में जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस मनमोहन की खंडपीठ ने साफ कर दिया कि अगर पत्नी ने तलाक के समझौते में अपने सारे मौद्रिक और भरण-पोषण के दावे स्वेच्छा से छोड़ दिए हैं, और उसे फैमिली कोर्ट के सामने दोबारा हलफनामे में दोहराया भी है, तो वह बाद में घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (डीवी एक्ट) के तहत वही दावे फिर से नहीं उठा सकती।
यह फैसला केवल एक दंपति के विवाद तक सीमित नहीं है। यह उन लाखों जोड़ों को प्रभावित करता है जो आपसी सहमति से तलाक लेते समय समझौता करते हैं, और बाद में यह सवाल उठता है कि क्या वह समझौता वाकई अंतिम है। आइए इस पूरे मामले को शुरू से समझते हैं — आसान भाषा में, बिना कानूनी शब्दजाल के बोझ के।
मामले की पृष्ठभूमि: 2016 का समझौता और 2017 का तलाक
यह विवाद रेजी बेबी (अपीलकर्ता-पति) और सुबी मैरी (प्रतिवादी संख्या 1-पत्नी) के बीच का है। दोनों ने 23 जुलाई 2016 को एक समझौता समझौता (Settlement Agreement) किया, जिसमें पत्नी ने पति के खिलाफ सभी भविष्य के मौद्रिक और भरण-पोषण संबंधी दावे स्पष्ट रूप से छोड़ दिए। यह कोई मौखिक बात नहीं थी — यह लिखित समझौता था।
इसके बाद 24 जनवरी 2017 को पत्नी ने फैमिली कोर्ट के सामने एक हलफनामा दाखिल कर इसी माफी को दोबारा दोहराया। इसके बाद दंपति ने भारतीय तलाक अधिनियम, 1869 (Divorce Act) की धारा 10A के तहत आपसी सहमति से तलाक के लिए संयुक्त आवेदन दिया, और 2017 में तलाक की डिक्री मिल गई। यानी तलाक की पूरी प्रक्रिया इसी समझौते की नींव पर टिकी थी।
लेकिन कुछ समय बाद पत्नी ने डीवी एक्ट के तहत शिकायत दर्ज करा दी और जुडिशियल फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट कोर्ट, कलमस्सेरी में एम.सी. संख्या 23/2017 की कार्यवाही शुरू हो गई, जिसमें फिर से मौद्रिक राहत मांगी गई थी। पति ने इसे रद्द कराने के लिए केरल हाई कोर्ट का रुख किया, लेकिन हाई कोर्ट ने 26 अक्टूबर 2018 को उसकी याचिका (CRL. MC No. 8568/2017) खारिज कर दी। इसी आदेश के खिलाफ पति सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट के सामने असली सवाल क्या था?
यह मामला आपराधिक अपील संख्या 1346/2021 के रूप में सुप्रीम कोर्ट में सूचीबद्ध हुआ। कोर्ट के सामने सवाल तकनीकी नहीं, बल्कि बुनियादी था — क्या वे मौद्रिक और भरण-पोषण के दावे, जिन्हें पत्नी ने समझौते में स्पष्ट रूप से छोड़ दिया था और फैमिली कोर्ट के सामने दोबारा पुष्टि की थी, बाद में डीवी एक्ट की कार्यवाही के जरिए फिर से जीवित किए जा सकते हैं?
पत्नी पक्ष की ओर से दलील दी गई कि समझौते में कोई प्रतिफल (consideration) या भरण-पोषण का प्रावधान नहीं था, इसलिए यह जबरदस्ती में किया गया लगता है। यह भी कहा गया कि जो समझौता सांविधिक और मौलिक अधिकारों की माफी का असर रखता हो, वह लोकनीति (public policy) के खिलाफ होने के कारण अमान्य है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा — फैसले का सार
जस्टिस मनमोहन द्वारा लिखे गए इस फैसले में कोर्ट ने साफ कहा कि एक बार जब पत्नी ने स्वेच्छा से भरण-पोषण सहित सभी मौद्रिक दावे छोड़ दिए, तो बाद की कार्यवाही के जरिए उन दावों को फिर से जिंदा करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने डीवी एक्ट की कार्यवाही को “प्रक्रिया का दुरुपयोग” (abuse of process) करार दिया।
कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए केरल हाई कोर्ट का 26 अक्टूबर 2018 का आदेश रद्द कर दिया और कलमस्सेरी की मजिस्ट्रेट अदालत में लंबित कार्यवाही को खारिज कर दिया। साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर पत्नी उस समझौते को कानूनी रूप से चुनौती दिए बिना दोबारा दावा नहीं कर सकती — यानी रास्ता पूरी तरह बंद नहीं है, बल्कि उसे पहले समझौते को ही अमान्य साबित करना होगा।

बेटी के अधिकार पर कोर्ट की अहम टिप्पणी
इस फैसले का एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दंपति की बेटी (प्रतिवादी संख्या 2), जो माता-पिता के बीच हुए समझौते के समय पहले ही वयस्क हो चुकी थी, उस समझौते की पक्षकार नहीं थी। इसलिए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी की माफी का असर बेटी के स्वतंत्र मौद्रिक अधिकारों पर नहीं पड़ता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि बेटी कानून के मुताबिक पिता के खिलाफ मौद्रिक राहत के लिए नई कार्यवाही शुरू करने के लिए स्वतंत्र है। यानी फैसला पत्नी के पहले से छोड़े गए दावों तक सीमित है — बेटी के अधिकार पूरी तरह सुरक्षित रखे गए हैं।
यह फैसला महत्वपूर्ण क्यों है?
1. समझौतों को मिलती है कानूनी मजबूती
यह फैसला भारत में वैवाहिक समझौतों की अंतिमता (finality) को मजबूत करता है। यह संदेश देता है कि कोई पक्ष बातचीत से हुए समझौते का फायदा नहीं उठा सकता, मौद्रिक दावे स्पष्ट रूप से छोड़ने के बाद फैमिली कोर्ट में उसकी पुष्टि नहीं कर सकता, समझौते के आधार पर तलाक हासिल नहीं कर सकता, और फिर उसी दावे को किसी दूसरी कार्यवाही के जरिए दोबारा नहीं उठा सकता।
2. DV एक्ट का दुरुपयोग रोकने की दिशा में कदम
यह फैसला उन मामलों पर लगाम लगाता है जहां डीवी एक्ट, जो मूलतः महिलाओं की सुरक्षा के लिए बना कानून है, का इस्तेमाल पहले से तय समझौतों को दरकिनार करने के लिए किया जा सकता था। कोर्ट ने इसे “प्रक्रिया का दुरुपयोग” कहकर एक स्पष्ट सीमा रेखा खींची है।
3. सीमाएं भी साफ हैं
लेकिन यह समझना जरूरी है कि यह फैसला हर भरण-पोषण के अधिकार को माफ करने योग्य नहीं बनाता, और न ही हर तलाक के बाद डीवी शिकायत को अपने आप खारिज कर देता है। फैसला इन खास तथ्यों पर टिका है — स्वेच्छा से किया गया समझौता, स्पष्ट माफी, बाद का हलफनामा, बिना चुनौती के मिली तलाक की डिक्री, और जबरदस्ती के किसी ठोस सबूत का अभाव। अगर इनमें से कोई तथ्य अलग हो — जैसे समझौता जबरदस्ती में हुआ हो, या उसे कानूनी तौर पर चुनौती दी गई हो — तो नतीजा अलग हो सकता है।
सामान्य लोगों के लिए इसका व्यावहारिक मतलब क्या है?
अगर आप तलाक की प्रक्रिया में हैं और समझौता करने जा रहे हैं, तो इस फैसले से कुछ जरूरी सबक मिलते हैं:
- समझौते में हस्ताक्षर करने से पहले हर शर्त को ध्यान से पढ़ें और समझें, खासकर भरण-पोषण और मौद्रिक दावों से जुड़े प्रावधान।
- अगर आपको लगता है कि समझौता दबाव या जबरदस्ती में हो रहा है, तो उसे स्वीकार करने से पहले किसी स्वतंत्र वकील से सलाह लें।
- फैमिली कोर्ट में हलफनामे के जरिए किसी बात की पुष्टि करना एक गंभीर कानूनी कदम है — इसे हल्के में न लें।
- नाबालिग या वयस्क बच्चों के अधिकार माता-पिता के आपसी समझौते से स्वतः प्रभावित नहीं होते — यह एक अलग कानूनी पहलू है।
Case : Reji Baby v. Subi Mary & Ors.
निष्कर्ष
रेजी बेबी बनाम सुबी मैरी का फैसला भारतीय पारिवारिक कानून में समझौतों की पवित्रता (sanctity of settlements) पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर है। यह उन लोगों को राहत देता है जो सोचते हैं कि एक बार तय हो चुका समझौता किसी भी समय दोबारा खोला जा सकता है। साथ ही, बेटी के स्वतंत्र अधिकारों को बरकरार रखकर कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि यह फैसला परिवार के हर सदस्य के अधिकार को नहीं, बल्कि विशेष रूप से पत्नी द्वारा स्वेच्छा से छोड़े गए दावों को ही संबोधित करता है। आने वाले समय में निचली अदालतें इस फैसले का इस्तेमाल समझौता-आधारित डीवी एक्ट शिकायतों की जांच के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर के तौर पर करेंगी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
सवाल: क्या डीवी एक्ट के तहत भरण-पोषण का अधिकार पूरी तरह माफ किया जा सकता है? इस फैसले के मुताबिक, अगर माफी स्वेच्छा से हुई हो और फैमिली कोर्ट के सामने दोहराई भी गई हो, तो उसे बाद में डीवी एक्ट के जरिए दोबारा दावा नहीं किया जा सकता — जब तक कि समझौते को कानूनी रूप से चुनौती न दी जाए।
सवाल: क्या इस फैसले का असर बच्चों के भरण-पोषण के अधिकार पर पड़ता है? नहीं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जो संतान समझौते की पक्षकार नहीं थी, उसके स्वतंत्र मौद्रिक अधिकार सुरक्षित रहते हैं।
सवाल: यह फैसला किस केस नंबर और तारीख का है? यह फैसला आपराधिक अपील संख्या 1346/2021 में 24 अगस्त 2026 को जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस मनमोहन की खंडपीठ ने सुनाया।




