नोएडा नहीं वसूल सकता बिल्डर की चूक का हर्जाना होमबायर्स से

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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: नोएडा नहीं वसूल सकता बिल्डर की चूक का हर्जाना होमबायर्स से

भूमिका: दस साल की प्रतीक्षा और इंसाफ की उम्मीद

नोएडा के सेक्टर 100 और 110 में बने ‘लोटस बुलेवार्ड’ और ‘लोटस पनाशे’ प्रोजेक्ट्स के हजारों घर खरीदारों के लिए बीता एक दशक किसी दुःस्वप्न से कम नहीं रहा। जिस घर के लिए उन्होंने जीवन भर की जमा-पूंजी लगाई, वह प्रोजेक्ट डेवलपर की आर्थिक बदहाली के कारण वर्षों तक अधूरा पड़ा रहा। जब आखिरकार होमबायर्स ने खुद पैसा जोड़कर निर्माण को आगे बढ़ाया, तब भी उन्हें बिल्डर की चूक का हर्जाना भरने के लिए कहा गया। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस अन्याय पर विराम लगाते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी असर वाला फैसला सुनाया है, जिसमें साफ कहा गया है कि नोएडा प्राधिकरण (NOIDA) मूल डेवलपर के डिफॉल्ट के लिए घर खरीदारों या नए रिज़ॉल्यूशन एप्लिकेंट को दंडित नहीं कर सकता।

यह फैसला जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने सुनाया, जिसमें नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) के उस आदेश को रद्द कर दिया गया, जिसमें टाइम एक्सटेंशन चार्ज को कॉरपोरेट इन्सॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन प्रोसेस (CIRP) की लागत मानने का निर्देश दिया गया था।

मामला क्या था: ग्रेनाइट गेट प्रॉपर्टीज़ बनाम नोएडा

यह पूरा विवाद ग्रेनाइट गेट प्रॉपर्टीज़ प्राइवेट लिमिटेड नामक डेवलपर से जुड़ा है, जिसने नोएडा प्राधिकरण से दो भूखंड लीज़ पर लेकर हाई-राइज़ अपार्टमेंट परियोजनाएं बनाने की योजना बनाई थी। समय के साथ कंपनी गंभीर वित्तीय संकट में फंस गई और उसे कॉरपोरेट इन्सॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन प्रोसेस (CIRP) से गुजरना पड़ा।

इस प्रक्रिया की एक खास बात यह रही कि क्रेडिटर्स की समिति (Committee of Creditors यानी CoC) पूरी तरह से होमबायर्स से बनी थी, क्योंकि वे ही इस डेवलपर के प्रमुख वित्तीय लेनदार (financial creditors) थे। निर्माण कार्य को आगे बढ़ाने के लिए होमबायर्स ने खुद अपनी जेब से पैसा जमा किया — इस व्यवस्था को ‘पूल एंड बिल्ड’ (Pool and Build) मैकेनिज्म कहा गया। बाद में एसएमवी एजेंसीज़ प्राइवेट लिमिटेड (SMV Agencies Private Limited) को सफल रिज़ॉल्यूशन एप्लिकेंट (Successful Resolution Applicant यानी SRA) के तौर पर मंजूरी दी गई।

लेकिन असली पेच यहां फंसा — नोएडा प्राधिकरण ने लीज़ डीड की शर्तों के आधार पर परियोजना पूरी न होने पर टाइम एक्सटेंशन चार्ज लगाया और इसे CIRP लागत में शामिल करने की मांग की। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब बकाया चार्ज न चुकाने पर नोएडा ने 16 अक्टूबर 2024 को लोटस पनाशे की तीन टावरों को सील कर दिया।

निचली अदालतों में क्या हुआ

जुलाई 2024 में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने इस मुद्दे पर आदेश पारित किया था। इसके बाद मामला NCLAT पहुंचा, जिसने आदेश में संशोधन करते हुए कहा कि लीज़ डीड के तहत तय अधिकतम तीन वर्ष की अवधि तक के टाइम एक्सटेंशन चार्ज को ही CIRP लागत माना जाएगा। इस आदेश से न तो होमबायर्स संतुष्ट थे और न ही नोएडा प्राधिकरण, जो दस साल तक के चार्ज की मांग कर रहा था। नतीजतन, दोनों पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

पक्षों की दलीलें

होमबायर्स की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ध्रुव मेहता ने अदालत में तर्क रखा कि टाइम एक्सटेंशन चार्ज मूलतः दंडात्मक (penal) प्रकृति के हैं और इन्हें इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड की धारा 5(13)(c) के तहत CIRP लागत में शामिल नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह न तो रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल द्वारा खर्च की गई राशि है और न ही यह सीधे परियोजना की निरंतरता के लिए हुआ खर्च है। उन्होंने यह भी बताया कि दिसंबर 2016 से लेकर 10 जनवरी 2019 तक की चूक पूरी तरह मूल डेवलपर की थी, न कि निर्दोष होमबायर्स की, इसलिए उन पर यह बोझ डालना गलत है।

दूसरी ओर, नोएडा प्राधिकरण का कहना था कि टाइम एक्सटेंशन चार्ज चुकाए बिना परियोजना आगे नहीं बढ़ सकती, इसलिए यह राशि CIRP लागत में शामिल की जानी ही चाहिए। दिलचस्प बात यह रही कि सफल रिज़ॉल्यूशन एप्लिकेंट ने भी इस मुद्दे पर होमबायर्स का ही साथ दिया।

सुप्रीम कोर्ट का तर्क: “पुराने पापों की सजा नई पीढ़ी को क्यों?”

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में बेहद संवेदनशील और तार्किक रुख अपनाया। पीठ ने स्पष्ट किया कि डेवलपर पर लगाया गया दंड भले ही परियोजना में देरी को रोकने के लिए एक निवारक उपाय (deterrent) के तौर पर हो, लेकिन जब डेवलपर खुद दिवालियेपन की प्रक्रिया से गुजर चुका है और परियोजना अब होमबायर्स के सामूहिक योगदान से पूरी हो रही है, तब यह दायित्व होमबायर्स या SRA पर नहीं डाला जा सकता।

अदालत ने अपने आदेश में साफ शब्दों में कहा कि होमबायर्स और सफल रिज़ॉल्यूशन एप्लिकेंट को कॉरपोरेट डेटर के पुराने पापों की सजा नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि जिस स्थानीय प्राधिकरण ने यह दंड लगाया है, उसका मूल उद्देश्य क्षेत्र के विकास को बढ़ावा देना है, न कि केवल राजस्व वसूलना।

फैसले में कोर्ट ने यह भी माना कि भले ही समय पर निर्माण पूरा कराने के लिए दंड की व्यवस्था ज़रूरी है, लेकिन जब देरी के लिए ज़िम्मेदार पक्ष (मूल डेवलपर) प्रक्रिया से बाहर हो चुका हो, तब निर्दोष पक्षों — यानी होमबायर्स और नए डेवलपर — को इसका खामियाजा भुगतने के लिए मजबूर करना न्यायसंगत नहीं है।

फैसले के मुख्य बिंदु एक नज़र में

  • सुप्रीम कोर्ट ने NCLAT के उस निर्देश को रद्द किया, जिसमें टाइम एक्सटेंशन चार्ज को CIRP लागत मानने को कहा गया था।
  • कोर्ट ने नोएडा प्राधिकरण की उस अपील को भी खारिज कर दिया, जिसमें दस साल तक के चार्ज की मांग की गई थी।
  • अदालत ने माना कि होमबायर्स वित्तीय लेनदार (financial creditors) की श्रेणी में आते हैं और उन्हें बिल्डर की चूक की सजा नहीं दी जा सकती।
  • यह भी स्पष्ट किया गया कि परियोजना पूरी करने के लिए होमबायर्स द्वारा जमा किया गया पैसा उन्हें दंड से मुक्त नहीं बल्कि और अधिक सुरक्षा का हकदार बनाता है।
  • नोएडा प्राधिकरण से कहा गया कि वह मौजूदा हालात को देखते हुए टाइम एक्सटेंशन चार्ज माफ करे।

इस फैसले का व्यापक असर

होमबायर्स के लिए राहत

यह फैसला केवल लोटस बुलेवार्ड और लोटस पनाशे के खरीदारों तक सीमित नहीं है। देशभर में ऐसे सैकड़ों प्रोजेक्ट्स हैं, जहां डेवलपर दिवालिया हो चुका है और होमबायर्स को न सिर्फ अपने पैसे की चिंता है, बल्कि प्राधिकरणों द्वारा लगाए गए तरह-तरह के जुर्माने और शुल्कों का भी सामना करना पड़ रहा है। यह फैसला एक मिसाल कायम करता है कि इन्सॉल्वेंसी प्रक्रिया के दौरान निर्दोष पक्षों को दंडात्मक शुल्कों से बचाया जाना चाहिए।

रिज़ॉल्यूशन एप्लिकेंट्स के लिए भरोसा

जब कोई नई कंपनी किसी दिवालिया प्रोजेक्ट को अपने हाथ में लेती है, तो उसे यह भरोसा चाहिए होता है कि पुराने डेवलपर की देनदारियां उस पर अतिरिक्त बोझ नहीं बनेंगी। यह फैसला निवेशकों और नए रिज़ॉल्यूशन एप्लिकेंट्स के लिए भी सकारात्मक संकेत है, जिससे अटके हुए प्रोजेक्ट्स को नए हाथों में सौंपने की प्रक्रिया आसान हो सकती है।

प्राधिकरणों की जवाबदेही

यह फैसला स्थानीय विकास प्राधिकरणों जैसे नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना अथॉरिटी के लिए भी एक स्पष्ट संदेश है — दंडात्मक शुल्क वसूलते समय यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि असली कसूरवार कौन है। केवल कानूनी प्रावधानों की कड़ाई से व्याख्या करके निर्दोष खरीदारों को सज़ा नहीं दी जा सकती।

कानूनी पहलू: IBC की धारा 5(13)(c) क्यों अहम है

इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) की धारा 5(13)(c) के तहत यह तय होता है कि CIRP के दौरान कौन-सा खर्च “इन्सॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन प्रोसेस कॉस्ट” माना जाएगा। होमबायर्स के वकील का यह तर्क अहम था कि टाइम एक्सटेंशन चार्ज न तो रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल द्वारा प्रक्रिया के संचालन के लिए खर्च की गई राशि है, और न ही यह सीधे परियोजना की निरंतरता सुनिश्चित करने के इरादे से लगाया गया शुल्क है — बल्कि यह विशुद्ध रूप से दंडात्मक प्रकृति का है। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि दंडात्मक प्रकृति के शुल्कों को सामान्य CIRP लागत के दायरे में लाना कानूनन उचित नहीं है।

निष्कर्ष: इंसाफ की जीत

यह फैसला सिर्फ कानूनी दृष्टि से ही नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनशीलता की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट ने यह स्वीकार किया कि घर खरीदारों की पीड़ा असाधारण है — उन्होंने न सिर्फ पैसा गंवाया, बल्कि वर्षों तक अपने सपनों के घर का इंतज़ार भी किया। ऐसे में डेवलपर की गलती की सजा उन्हें देना न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ होता। यह फैसला भविष्य में इसी तरह के मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण नज़ीर (precedent) बनेगा और रियल एस्टेट सेक्टर में फंसे लाखों होमबायर्स के लिए उम्मीद की एक नई किरण साबित हो सकता है।

Cause Title: The Authorised Representative for Granite Gate Properties Private Limited Rakesh Verma Versus M/s New Okhla Industrial Development Authority and Ors.

Click here to download judgment

Supreme Court of India building representing the verdict protecting homebuyers from NOIDA's time extension penalty charges in insolvency case

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