पति पत्नी को ज़बरदस्ती घर नहीं ला सकता – सुप्रीम कोर्ट

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सुप्रीम कोर्ट साफ कह चुका है: पति पत्नी को ज़बरदस्ती घर नहीं ला सकता — पूरा कानून समझिए

शादी टूटने की कगार पर हो, या पत्नी किसी वजह से मायके चली गई हो — बहुत से पतियों के मन में एक ही सवाल आता है: “क्या मैं कोर्ट के ज़रिए अपनी पत्नी को वापस घर ला सकता हूँ?” जवाब है — कानूनी तौर पर कोर्ट आदेश तो दे सकता है, लेकिन किसी को भी ज़बरदस्ती, पुलिस बल या धमकी देकर वापस घर नहीं लाया जा सकता। यह न सिर्फ कानून की भावना के खिलाफ है, बल्कि सीधे-सीधे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिली गरिमा, निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन भी है।

आइए, 35 साल के कानूनी पत्रकारिता के अनुभव से इस पूरे मसले को आसान भाषा में, तथ्यों और असली फैसलों के आधार पर समझते हैं।

दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना (RCR) आखिर है क्या?

भारत में हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 के तहत एक प्रावधान है जिसे “Restitution of Conjugal Rights” यानी दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना कहा जाता है। सीधी भाषा में समझें तो —

  • अगर पति या पत्नी में से कोई एक “बिना उचित कारण” के दूसरे का साथ छोड़ देता है,
  • तो पीड़ित पक्ष फैमिली कोर्ट में याचिका दाखिल कर सकता है,
  • और कोर्ट से मांग कर सकता है कि साथी को वापस साथ रहने का निर्देश दिया जाए।

यह कानून महिला और पुरुष दोनों के लिए बराबर लागू होता है — यानी पत्नी भी पति के खिलाफ यह याचिका डाल सकती है। स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 की धारा 22 में भी यही प्रावधान है।

पर क्या कोर्ट का आदेश ज़बरदस्ती लागू हो सकता है?

यहीं पर आम लोगों में सबसे बड़ी गलतफहमी है। मान लीजिए कोर्ट ने पति के पक्ष में RCR का डिक्री (आदेश) पारित कर दिया — क्या इसके बाद पुलिस या कोर्ट-अधिकारी पत्नी को उठाकर घर पहुंचा देंगे? बिल्कुल नहीं।

सिविल प्रोसीजर कोड (CPC) के ऑर्डर 21, नियम 32 और 33 के तहत RCR डिक्री को लागू कराने का सिर्फ एक ही तरीका है — अगर साथी डिक्री का पालन नहीं करता, तो कोर्ट उसकी संपत्ति कुर्क (अटैच) कर सकता है। किसी भी हालत में शरीर बल, पुलिस बल या हिरासत के ज़रिए किसी वयस्क व्यक्ति को उसकी मर्ज़ी के खिलाफ ससुराल या मायके नहीं भेजा जा सकता। यह सिद्धांत भारतीय न्यायपालिका में दशकों से स्थापित है।

1984 का ऐतिहासिक फैसला — जो अब भी आधार है

इस विषय पर सबसे पुराना और महत्वपूर्ण फैसला है सरोज रानी बनाम सुदर्शन कुमार चड्ढा (1984)। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने धारा 9 की संवैधानिकता को बरकरार रखा था, यानी यह प्रावधान कानूनी रूप से वैध है। लेकिन साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस डिक्री को लागू कराने का तरीका सिर्फ संपत्ति कुर्की के ज़रिए है, ज़बरदस्ती वापसी के ज़रिए नहीं।

इसी फैसले के आधार पर आज तक निचली अदालतें और हाईकोर्ट यह मानते आए हैं कि RCR डिक्री केवल एक “कानूनी सिफारिश” है, किसी को घसीटकर लाने का लाइसेंस नहीं।

निजता और गरिमा का सवाल — अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित

समय के साथ यह बहस तेज़ हुई है कि क्या धारा 9 खुद ही असंवैधानिक है, क्योंकि यह निजता (Privacy) और व्यक्तिगत स्वायत्तता (Autonomy) के मौलिक अधिकार से टकराती है। इसी सवाल पर ओजस्व पाठक बनाम भारत संघ (Ojaswa Pathak vs Union of India) नाम की एक याचिका 2019 से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह प्रावधान महिलाओं पर असंगत बोझ डालता है और संविधान के अनुच्छेद 14, 15(1) और 21 का उल्लंघन करता है।

इस याचिका का आधार दो बड़े फैसले हैं —

  • के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017) — जिसमें निजता को मौलिक अधिकार माना गया।
  • जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ (2018), जिसमें कोर्ट ने कहा था कि पारिवारिक ढांचे को ऐसी “निजी जगह” नहीं माना जा सकता जहां संवैधानिक अधिकारों का हनन बेरोकटोक चलता रहे।

चूंकि यह मामला अभी सुनवाई की प्रक्रिया में है, इसलिए इसे “अंतिम फैसला” कहना सही नहीं होगा — लेकिन यह दिखाता है कि अदालत में यह सवाल गंभीरता से उठाया जा चुका है।

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जनवरी 2025 का ताज़ा फैसला — भरण-पोषण का अधिकार बरकरार

इस मुद्दे पर सबसे हालिया और व्यावहारिक फैसला 10 जनवरी 2025 को आया। मामला था R बनाम D (2025 INSC 55), जिसकी सुनवाई तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की बेंच ने की।

इस केस में पति ने RCR की डिक्री जीत ली थी, लेकिन पत्नी अत्याचार और दहेज उत्पीड़न के आरोपों के चलते वापस नहीं लौटी। झारखंड हाईकोर्ट ने कहा था कि चूंकि पत्नी डिक्री का पालन नहीं कर रही, इसलिए वह भरण-पोषण (maintenance) की हकदार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए साफ कहा —

  • केवल RCR डिक्री का पालन न करना खुद में पत्नी को भरण-पोषण से वंचित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
  • अगर पत्नी के पास घर छोड़ने का उचित और सिद्ध कारण है, तो सीआरपीसी की धारा 125(4) के तहत उसे भरण-पोषण से इनकार नहीं किया जा सकता।
  • पति को हर महीने ₹10,000 भरण-पोषण देने का आदेश बहाल कर दिया गया।

यह फैसला व्यवहारिक स्तर पर बहुत मायने रखता है, क्योंकि इसने यह संदेश साफ कर दिया कि RCR डिक्री को किसी महिला को आर्थिक रूप से मजबूर या दंडित करने के हथियार के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

अनुच्छेद 21 — गरिमा के साथ जीने का अधिकार

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 कहता है कि हर व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार है, और यह सिर्फ “जिंदा रहने” तक सीमित नहीं, बल्कि गरिमा (dignity), निजता (privacy) और आत्म-निर्णय (autonomy) के साथ जीने का अधिकार है। पुट्टास्वामी फैसले के बाद से अदालतें इसी सिद्धांत के आधार पर पारिवारिक विवादों को भी देख रही हैं — यानी शादी के भीतर भी कोई व्यक्ति अपने बुनियादी अधिकार नहीं खो देता।

अगर पत्नी वापस नहीं जाना चाहती तो पति के पास विकल्प क्या हैं?

चूंकि RCR डिक्री ज़बरदस्ती लागू नहीं हो सकती, ऐसे में कानून एक और रास्ता देता है —

  • अगर RCR डिक्री पारित होने के बाद भी एक साल तक दोनों पक्ष साथ नहीं रहते,
  • तो यह स्थिति खुद हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1A) के तहत तलाक का आधार बन जाती है।

यानी कानून की मंशा साफ है — किसी को साथ रहने के लिए मजबूर करने के बजाय, अगर रिश्ता सच में टूट चुका है तो उसे कानूनी तरीके से खत्म करने का रास्ता दिया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

क्या पुलिस पत्नी को ज़बरदस्ती ससुराल भिजवा सकती है? नहीं। कोई भी कोर्ट आदेश या पुलिस बल किसी वयस्क महिला को उसकी मर्ज़ी के खिलाफ किसी घर में रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।

क्या RCR डिक्री का पालन न करने पर पत्नी की भरण-पोषण की हकदारी खत्म हो जाती है? हमेशा नहीं। सुप्रीम कोर्ट के 2025 के फैसले के अनुसार, अगर घर छोड़ने का उचित कारण साबित हो, तो भरण-पोषण का अधिकार बना रहता है।

क्या धारा 9 (RCR) को असंवैधानिक घोषित कर दिया गया है? अभी नहीं। ओजस्व पाठक बनाम भारत संघ याचिका इस सवाल पर सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, फैसला अभी नहीं आया है।

सार में समझें

पति हो या पत्नी — कोई भी कोर्ट के ज़रिए साथी को कानूनी दबाव तो बना सकता है, लेकिन उसे ज़बरदस्ती घर वापस लाने का अधिकार किसी को नहीं है। यह भारतीय कानून का दशकों पुराना और स्थापित सिद्धांत है, जिसे सरोज रानी जैसे पुराने फैसलों से लेकर 2025 के ताज़ा फैसले तक लगातार मजबूती मिली है। हर व्यक्ति — चाहे पति हो या पत्नी — की गरिमा, निजता और स्वतंत्रता संविधान की गारंटी है, और शादी का रिश्ता इस गारंटी को छीन नहीं सकता।

For More info : WhatsApp on : +91-8980028995

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