वैवाहिक विवादों में गुज़ारा-भत्ते को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम स्पष्टीकरण दिया है। कोर्ट ने कहा है कि यदि पति दाण्डिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125(4) के तहत अर्जी दाखिल करते हुए यह साबित कर दे कि उसकी पत्नी का किसी अन्य व्यक्ति के साथ अवैध संबंध (व्यभिचार) है, और यह सबूत शुरुआती स्तर पर ही स्पष्ट रूप से सामने आ जाए, तो अदालत पत्नी को अंतरिम गुज़ारा-भत्ता देने से इनकार कर सकती है। यह फैसला उन तमाम मामलों के लिए मिसाल बनेगा, जहां निचली अदालतें ऐसे विवादास्पद तथ्यात्मक सवालों को सिर्फ अंतिम सुनवाई तक टालती रही हैं।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने यह व्यवस्था एक पति की अपील पर सुनवाई करते हुए दी, जिसमें राजस्थान की निचली अदालतों और हाईकोर्ट ने पति की व्यभिचार संबंधी अर्जी को शुरुआती चरण में ही खारिज कर दिया था।
मामला क्या था? जानिए पूरी पृष्ठभूमि
यह विवाद 2014 में हुई एक शादी से जुड़ा है। अपीलकर्ता (पति) ने 2014 में प्रतिवादी संख्या-2 (पत्नी) से विवाह किया था। कुछ वर्षों बाद दोनों के रिश्तों में तनाव बढ़ने लगा और 2020 में पत्नी बच्चे तथा कीमती सामान लेकर ससुराल छोड़कर चली गई। इसके बाद उसने CrPC की धारा 125 के तहत गुज़ारा-भत्ते की मांग करते हुए अदालत का दरवाज़ा खटखटाया।
जवाब में पति ने CrPC की धारा 125(4) के तहत अलग से अर्जी दाखिल की। इस प्रावधान के अनुसार, अगर पत्नी व्यभिचार में लिप्त हो, अपनी मर्ज़ी से पति से अलग रह रही हो, या दोनों आपसी सहमति से अलग रह रहे हों, तो वह गुज़ारा-भत्ते की हकदार नहीं मानी जाती। पति ने इस अर्जी के समर्थन में पत्नी की कथित बेवफाई से जुड़ी तस्वीरें और अन्य दस्तावेज़ी सबूत पेश किए।
निचली अदालतों का रुख: “फैसला सिर्फ अंतिम सुनवाई में ही संभव”
ट्रायल कोर्ट ने पति की इस अर्जी को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि पेश किए गए दस्तावेज़ों की प्रामाणिकता और सत्यता की जांच तभी हो सकती है, जब मुख्य मामले में औपचारिक रूप से सबूत दर्ज कराए जाएं। यानी अदालत की राय में, व्यभिचार जैसे गंभीर आरोप पर फैसला अंतरिम स्तर पर संभव ही नहीं है।
पति ने इस आदेश को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के रुख को सही ठहराया। हाईकोर्ट का मानना था कि अंतरिम गुज़ारा-भत्ते पर फैसला सुनाने से पहले व्यभिचार जैसे विवादित तथ्यात्मक मुद्दे पर अलग से फैसला करने का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। इसके बाद पति ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पलटा फैसला?
जस्टिस करोल द्वारा लिखे गए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि निचली अदालतों ने अपीलकर्ता की धारा 125(4) की अर्जी को शुरुआती चरण में ही, बिना ठीक से परखे खारिज करके गलती की। कोर्ट के अनुसार, जब पति द्वारा पेश सबूतों से पत्नी के अवैध संबंधों की बात प्रथम दृष्टया साफ तौर पर उभरकर सामने आ जाए, तो अदालत के लिए ज़रूरी हो जाता है कि वह उस अर्जी पर गुण-दोष के आधार पर विचार करे, न कि उसे केवल यह कहकर टाल दे कि फैसला बाद में होगा।
पीठ ने इस बात पर भी जोर दिया कि अगर हर बार ऐसे मुद्दों को अंतिम सुनवाई तक टाला जाता रहा, तो धारा 125(4) में दी गई विशेष व्यवस्था का कोई मतलब ही नहीं रह जाएगा — यानी कानून का यह प्रावधान व्यावहारिक रूप से बेकार हो जाएगा। दूसरे शब्दों में, विधायिका ने जानबूझकर यह प्रावधान इसलिए बनाया है ताकि साफ तौर पर सामने आए दुराचार के मामलों में अदालतें शुरुआती स्तर पर ही राहत या इनकार का फैसला ले सकें।

अदालत की मुख्य टिप्पणी
बेंच ने स्पष्ट किया कि पति की तरफ से पेश सबूत अगर पहली ही नज़र में (ex-facie) आरोप को साबित कर दें, तभी अंतरिम गुज़ारा-भत्ता रोकने का आधार बनता है — यह कोई सामान्य या मामूली संदेह पर आधारित इनकार नहीं है, बल्कि सबूतों के स्पष्ट रूप से सामने आने पर ही लागू होने वाली व्यवस्था है। इसी आधार पर कोर्ट ने विवादित आदेश रद्द करते हुए मामला वापस ट्रायल कोर्ट भेज दिया, ताकि वह इस मुद्दे पर गुण-दोष के आधार पर नए सिरे से फैसला कर सके।
धारा 125(4) CrPC को समझें: कब नहीं मिलता गुज़ारा-भत्ता?
CrPC की धारा 125 पत्नी, बच्चों और माता-पिता के भरण-पोषण का अधिकार सुनिश्चित करती है। लेकिन इसी धारा की उपधारा (4) में कुछ अपवाद भी तय किए गए हैं। अगर निम्न में से कोई स्थिति साबित हो जाए, तो पत्नी गुज़ारा-भत्ते की हकदार नहीं रहती:
- पत्नी व्यभिचार (एक्स्ट्रा-मैरिटल संबंध) में लिप्त हो
- पत्नी बिना किसी उचित कारण के पति से अलग रह रही हो
- दोनों पक्ष आपसी सहमति से अलग-अलग रह रहे हों
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहले बिंदु — व्यभिचार — से जुड़े कानूनी सिद्धांत को और स्पष्ट किया है।
इस फैसले का व्यावहारिक असर क्या होगा?
यह फैसला भारत भर की पारिवारिक अदालतों और मजिस्ट्रेट अदालतों के लिए दिशा-निर्देश का काम करेगा। अब तक कई अदालतें व्यभिचार जैसे संवेदनशील और विवादित तथ्यात्मक सवालों को छूने से बचती थीं, और अंतरिम गुज़ारा-भत्ता लगभग स्वतः ही मंजूर कर देती थीं। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद, जहां पति के पास शुरुआत में ही ठोस और स्पष्ट सबूत मौजूद हों, वहां अदालतों को उन सबूतों का मूल्यांकन किए बिना अंतरिम राहत नहीं देनी चाहिए।
हालांकि, यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि कोर्ट ने यह सुरक्षा उपाय भी जोड़ा है कि इनकार तभी हो सकता है जब आरोप “ex-facie” यानी पहली नज़र में ही सिद्ध होता दिखे — महज आरोप लगाने या शक जताने भर से पत्नी का अधिकार समाप्त नहीं होगा। यह संतुलन दोनों पक्षों — पति के वाजिब बचाव के अधिकार और पत्नी के भरण-पोषण के मौलिक अधिकार — के बीच बनाए रखने की कोशिश करता है।
केस का ब्यौरा
मामले का शीर्षक: हिमांशु चोरडिया बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य
Cause Title: HIMANSHU CHORDIA VERSUS STATE OF RAJASTHAN & ANR.
डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य कानूनी जानकारी और मीडिया रिपोर्ट पर आधारित है। किसी विशिष्ट मामले में कानूनी सलाह के लिए योग्य अधिवक्ता से संपर्क करें।
Supreme Court bench of Justice Sanjay Karol and Justice Vipul Pancholi ruling on interim maintenance and adultery under Section 125 CrPC




