बैंक खाता फ्रीज करने के लिए अब सिर्फ शक काफी नहीं, चाहिए ठोस आधार
प्रवर्तन निदेशालय (ED) के अधिकार क्षेत्र से जुड़ा एक बेहद अहम फैसला सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया है, जो हजारों उन नागरिकों के लिए राहत की खबर है जिनके बैंक खाते मनी लॉन्ड्रिंग जांच की आंच में बिना किसी ठोस वजह के फ्रीज कर दिए जाते हैं। शीर्ष अदालत ने साफ कर दिया है कि धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2000 की धारा 17(1A) के तहत किसी भी बैंक खाते को फ्रीज करने के लिए केवल ‘संदेह’ पर्याप्त नहीं है — इसके लिए सक्षम प्राधिकारी के पास लिखित रूप में दर्ज ‘Reasons to Believe’ यानी विश्वास करने के ठोस कारण होने चाहिए।
क्या था पूरा मामला
यह विवाद पूनम मलिक नाम की एक महिला के दो बैंक खातों को फ्रीज किए जाने से जुड़ा है। पूनम मलिक, रंजीत मलिक की पत्नी हैं, और रंजीत मलिक कथित तौर पर गगन धवन से जुड़े बताए गए हैं, जो बहुचर्चित स्टर्लिंग बायोटेक बैंक धोखाधड़ी मामले में आरोपी हैं। दिलचस्प बात यह रही कि न तो पूनम मलिक और न ही उनके पति रंजीत मलिक का नाम मूल FIR या ED की ECIR (एनफोर्समेंट केस इंफॉर्मेशन रिपोर्ट) में कहीं दर्ज था।
इसके बावजूद ED ने पूनम मलिक के बैंक खाते फ्रीज करने का आदेश जारी कर दिया। आदेश में सिर्फ इतना लिखा था कि “संदेह है कि इस बैंक खाते में मनी लॉन्ड्रिंग की रकम हो सकती है”, इसलिए खाते से डेबिट लेनदेन तत्काल रोका जाए।
जांच से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का सफर
ED के इस फ्रीजिंग आदेश को शुरू में निर्णायक प्राधिकरण (Adjudicating Authority) ने बरकरार रखा, लेकिन जब मामला अपीलीय अधिकरण (Appellate Tribunal) पहुंचा, तो उसने ED के आदेश को रद्द कर दिया। इसके बाद ED ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया।
दिल्ली हाईकोर्ट ने ED की दलीलों को खारिज करते हुए यह आदेश अवैध करार दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि बिना वैधानिक प्रक्रिया और आवश्यक शर्तों को पूरा किए जारी किया गया फ्रीजिंग आदेश कानूनी कसौटी पर टिक नहीं सकता। इतना ही नहीं, हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि बिना उचित आधार के किसी नागरिक का बैंक खाता फ्रीज करना संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत मिले संपत्ति के अधिकार का सीधा उल्लंघन है। इस फैसले के खिलाफ ED सुप्रीम कोर्ट पहुंची।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने क्या कहा
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की खंडपीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट की व्याख्या से पूरी तरह सहमति जताई। बेंच ने कहा कि भले ही PMLA की धारा 17(1A) में शब्दशः “Reasons to Believe” का उल्लेख नहीं है, फिर भी इसे धारा 17(1) से अलग करके नहीं पढ़ा जा सकता।
अदालत का तर्क सीधा और तार्किक था — किसी संपत्ति या खाते की जब्ती (Seizure) के लिए कानून में ‘Reasons to Believe’ का होना अनिवार्य शर्त है, और चूंकि फ्रीज करना जब्ती का ही एक वैकल्पिक और हल्का स्वरूप है, इसलिए दोनों पर एक जैसा कानूनी मानक लागू होगा। यानी अधिकारी अपनी मर्जी से या हल्के-फुल्के शक के आधार पर किसी का खाता रोक नहीं सकता; उसे यह दर्ज करना होगा कि उसके पास विश्वास करने के ठोस, दर्ज किए जाने योग्य कारण मौजूद हैं। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने ED की अपील खारिज करते हुए हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा।
आम नागरिकों और कानूनी जगत के लिए इस फैसले के मायने
यह फैसला केवल एक व्यक्ति विशेष के बैंक खातों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह PMLA के तहत ED को मिली शक्तियों के इस्तेमाल पर एक महत्वपूर्ण न्यायिक अंकुश है। हाल के वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां जांच एजेंसियों पर बिना ठोस सबूत के बैंक खाते फ्रीज करने के आरोप लगे, जिससे आम नागरिकों और कारोबारियों को भारी परेशानी झेलनी पड़ी। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख इस बात की पुष्टि करता है कि जांच एजेंसी की शक्तियां, चाहे वे कितनी भी व्यापक क्यों न हों, संविधान के मूल अधिकारों — खासकर संपत्ति के अधिकार — की सीमा के भीतर ही रहनी चाहिए। साथ ही यह भी स्पष्ट संकेत है कि जिस व्यक्ति का नाम FIR या ECIR में नहीं है, उसके खिलाफ सिर्फ किसी आरोपी से पारिवारिक या सामाजिक संबंध के आधार पर कार्रवाई करना कानूनन उचित नहीं ठहराया जा सकता।
(यह लेख कानूनी जानकारी के सामान्य प्रसार हेतु है। किसी विशिष्ट मामले में कानूनी सलाह के लिए योग्य अधिवक्ता से परामर्श लें।)
Supreme Court gavel with bank account and PMLA document symbolizing ED freeze order ruling

