क्या आरोप तय हुए बिना भी अदालत किसी को दोषी ठहरा सकती है? सुप्रीम कोर्ट ने दिया विस्तृत जवाब
आपराधिक मुकदमे की सुनवाई में “आरोप तय करना” (Framing of Charge) एक बुनियादी और अनिवार्य कदम माना जाता है। यही वह चरण है, जहां आरोपी को यह स्पष्ट रूप से बता दिया जाता है कि उस पर वास्तव में क्या आरोप है, ताकि वह उसका बचाव तैयार कर सके। लेकिन क्या हो, अगर ट्रायल कोर्ट किसी खास धारा के तहत आरोप तय करना भूल जाए, और मामला अपीलीय अदालत तक पहुंचे? क्या ऐसे में आरोपी को उस “बिना तय हुए” आरोप से बरी कर दिया जाएगा, या फिर भी उसे दोषी ठहराया जा सकता है?
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में इसी सवाल पर विस्तार से रोशनी डाली है, और स्पष्ट किया है कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 464 के तहत, कुछ शर्तों के पूरा होने पर, अदालत ऐसे अपराध के लिए भी दोषसिद्धि बरकरार रख सकती है, जिसके लिए औपचारिक रूप से आरोप तय ही नहीं किया गया था।
मामला क्या था?
यह फैसला जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने ‘बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम, 2012’ (POCSO Act) से जुड़े एक मामले में सुनाया। इस मामले में अपीलकर्ता को POCSO Act की धारा 3/4 के तहत ‘पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट’ के आरोप में दोषी ठहराया गया था। लेकिन अपील की सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि अभियोजन पक्ष पीड़िता की उम्र को ‘जुवेनाइल जस्टिस एक्ट’ की धारा 94 के तहत निर्धारित प्रक्रिया से साबित नहीं कर पाया।
चूंकि POCSO Act लागू होने के लिए पीड़ित का नाबालिग होना जरूरी शर्त है, इसलिए अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि उम्र साबित न होने के कारण उसे बरी किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और इसके बजाय, अपीलकर्ता को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 के तहत बलात्कार के अपराध में दोषी करार दिया — भले ही मुकदमे के दौरान उस पर विशेष रूप से यह आरोप तय नहीं किया गया था।
आरोपी की मुख्य दलील
अपीलकर्ता का कहना था कि जब उस पर बलात्कार का आरोप औपचारिक रूप से तय ही नहीं हुआ, तो उसे इस आरोप से बचाव करने का कोई अवसर भी नहीं मिला। ऐसे में, बिना उचित मौका दिए उसे इस अपराध के लिए दोषी ठहराना अनुचित है।
सुप्रीम कोर्ट का तर्क: दोनों अपराधों का ‘एक्टस रीअस’ एक जैसा
कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किया। पीठ के अनुसार, IPC की धारा 375 (बलात्कार) और POCSO Act की धारा 3 (पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट) में अपराध का आपराधिक कृत्य यानी ‘एक्टस रीअस’ लगभग समान है। दोनों प्रावधानों के बीच मुख्य फर्क सिर्फ इतना है कि पीड़ित नाबालिग है या नहीं — यही तथ्य तय करता है कि आरोपी पर IPC की धारा 376 लगेगी या POCSO Act की धारा 4।
कोर्ट ने समझाया कि आमतौर पर जब पीड़ित नाबालिग होता है, तो आरोपी पर POCSO Act की धारा 4 के साथ-साथ IPC की धारा 376 के तहत भी मुकदमा चलाया जाता है। ऐसी स्थिति में अगर ट्रायल कोर्ट गलती से धारा 376 का आरोप तय करना भूल जाए, लेकिन यौन उत्पीड़न की घटना पूरी तरह साबित हो जाए, और अभियोजन पक्ष सिर्फ पीड़ित की उम्र साबित करने में असफल रहे — तो POCSO Act का आरोप भले ही टूट जाए, पर IPC की धारा 376 के तहत मुकदमा आगे चल सकता है।
धारा 464 CrPC: कब माना जाएगा ‘न्याय में चूक’?
पूरे फैसले की बुनियाद CrPC की धारा 464 है। यह प्रावधान कहता है कि सिर्फ इसलिए कि किसी अपराध के लिए आरोप तय नहीं हुआ, कोई भी सजा या दोषसिद्धि अमान्य नहीं मानी जाएगी — जब तक कि अपीलीय या रिविजनल कोर्ट को यह न लगे कि इससे वास्तव में न्याय में चूक (Failure of Justice) हुई है।
कोर्ट ने तीन कसौटियां तय कीं, जिनके आधार पर यह जांचा जाना चाहिए कि न्याय में चूक हुई है या नहीं:
- आरोपी को उस अपराध के मुख्य तत्वों की जानकारी थी या नहीं, जिसके लिए उसे अंततः दोषी ठहराया जा रहा है।
- क्या उसके खिलाफ साबित किए जाने वाले मुख्य तथ्य उसे स्पष्ट रूप से समझाए गए थे।
- क्या उसे अपना बचाव पेश करने का उचित और वास्तविक अवसर मिला था।
कोर्ट के मुताबिक, अगर आरोपी को POCSO Act की धारा 3 के तहत लगे आरोप के खिलाफ बचाव करने का पूरा मौका मिला — जो प्रकृति में IPC की धारा 376 के समान ही है — तो यह मान लेना गलत नहीं होगा कि उसे व्यावहारिक रूप से बलात्कार के आरोप का भी सामना करने और उसका जवाब देने का मौका मिल चुका था। इसलिए, सिर्फ औपचारिक रूप से धारा 376 का आरोप न तय होने से उसे कोई राहत नहीं मिलेगी।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह छूट असीमित नहीं है। अगर आरोपी पर मूल रूप से लगाए गए अपराध से “बिल्कुल अलग प्रकृति” का कोई अपराध साबित करने की कोशिश की जाती, तो उस स्थिति में बिना आरोप तय किए दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं होता। यानी यह सिद्धांत सिर्फ ‘मिलते-जुलते’ (cognate) या समान प्रकृति के अपराधों पर ही लागू होता है, पूरी तरह अनजान या असंबंधित अपराध पर नहीं।
दलबीर सिंह बनाम यूपी राज्य (2004) का संदर्भ
अपने फैसले में कोर्ट ने पुराने नजीर दलबीर सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2004) का हवाला दिया। उस मामले में आरोपी पर IPC की धारा 302, 498-A और 304-B के तहत मुकदमा चलाया गया था, लेकिन उसे आखिरकार धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत दोषी ठहराया गया, जबकि यह आरोप औपचारिक रूप से तय ही नहीं हुआ था। उस फैसले में भी यही तीन शर्तें रखी गई थीं, जिनका पालन होने पर अपीलीय या रिविजनल कोर्ट बिना आरोप तय हुए भी दोषसिद्धि बरकरार रख सकती है।
अपीलीय कोर्ट की शक्तियों पर स्पष्टता
फैसले में यह भी रेखांकित किया गया कि अगर ट्रायल कोर्ट किसी जरूरी आरोप को तय करने में चूक जाए, तो इससे अपीलीय कोर्ट की शक्तियां सीमित नहीं होतीं। अपीलीय कोर्ट के पास सजा के निष्कर्ष, स्वरूप और अवधि में उचित बदलाव करने की व्यापक शक्तियां बनी रहती हैं, जिसमें जरूरत के मुताबिक संशोधन या परिणामी आदेश पारित करना भी शामिल है।
अंतिम फैसला
इन सभी सिद्धांतों को लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया। कोर्ट ने पाया कि 27 नवंबर 2019 की मेडिको-लीगल रिपोर्ट सहित उपलब्ध सबूतों से यह साबित होता है कि अपीलकर्ता ने पीड़िता के साथ पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट किया और उसे आपराधिक रूप से धमकाया भी। नतीजतन, अपीलकर्ता की दोषसिद्धि को POCSO Act की जगह IPC की धारा 375/376 के तहत बलात्कार के अपराध में बदल दिया गया, जबकि आपराधिक धमकी (IPC धारा 506) से जुड़ी दोषसिद्धि और सजा को ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसले के अनुरूप बरकरार रखा गया।
केस का शीर्षक: Pynchemalangaki Bareh Versus State of Meghalaya
इस फैसले का व्यावहारिक महत्व
यह फैसला आपराधिक न्याय प्रणाली में एक अहम संतुलन साधता है — एक तरफ आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई के मौलिक अधिकार की रक्षा करता है, तो दूसरी तरफ यह सुनिश्चित करता है कि महज तकनीकी चूक की वजह से किसी दोषी को छूट न मिल जाए। यह स्पष्ट करता है कि अदालतें मामले के सार (Substance) को देखेंगी, केवल कागजी प्रक्रिया की खामी को नहीं — बशर्ते आरोपी को अपना बचाव करने का वास्तविक और पूरा अवसर मिला हो।




