सिर्फ़ टिकट न मिलना मुआवज़े से इनकार की वजह नहीं: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
मामला क्या है
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि किसी दुर्घटनाग्रस्त यात्री के पास से रेलवे टिकट बरामद न होना, अपने आप में उसके परिवार के मुआवज़े के दावे को खारिज करने का आधार नहीं बन सकता। जस्टिस उज्ज्वल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की खंडपीठ ने यह टिप्पणी शुक्रवार, 25 सितंबर को एक मृत यात्री के माता-पिता की अपील पर सुनवाई करते हुए की। अदालत ने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल द्वारा दिए गए मुआवज़े के आदेश को बहाल कर दिया, जिसे गुजरात हाईकोर्ट ने पहले रद्द कर दिया था।
घटना की पृष्ठभूमि
सितंबर 2017 में अपीलकर्ताओं का बेटा अहमदाबाद होते हुए सूरत की यात्रा कर रहा था। इस दौरान वह अचानक झटके के कारण ट्रेन से गिर गया और उसे गंभीर चोटें आईं। उसे तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन एक महीने से ज़्यादा समय तक इलाज चलने के बावजूद अक्टूबर 2017 में उसकी मौत हो गई।
बेटे की मौत के बाद माता-पिता ने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल एक्ट, 1987 की धारा 16 के तहत मुआवज़े की अर्ज़ी दाखिल की। ट्रिब्यूनल ने इसे रेलवे एक्ट, 1989 की धारा 123(c)(2) के दायरे में आने वाली “अनचाही घटना” (untoward incident) मानते हुए 8 लाख रुपये मुआवज़ा और घटना की तारीख से 9% सालाना ब्याज देने का आदेश दिया।
केंद्र सरकार ने इस आदेश को 1987 के एक्ट की धारा 23 के तहत गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने यह मानते हुए ट्रिब्यूनल का आदेश पलट दिया कि पीड़ित के ट्रेन से गिरने का कोई पुख्ता सबूत मौजूद नहीं था, इसलिए इसे “अनचाही घटना” की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इसी फैसले के खिलाफ माता-पिता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।
दोनों पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट नचिकेत जोशी ने दलील दी कि दावा अर्ज़ी में शुरू से ही यह स्पष्ट किया गया था कि मृतक का टिकट उसके अन्य निजी सामान के साथ खो गया था। उनका तर्क था कि एक बार यह तथ्य सामने आने के बाद यह साबित करने की ज़िम्मेदारी रेलवे पर आ जाती है कि पीड़ित बिना वैध अधिकार के यात्रा कर रहा था — और रेलवे इस ज़िम्मेदारी को निभाने में विफल रहा। इस दलील के समर्थन में कलंदी चरण साहू बनाम जनरल मैनेजर, साउथ-ईस्ट सेंट्रल रेलवे मामले का हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया था कि रेलवे यात्री (अप्रिय घटनाओं की जांच का तरीका) नियम, 2003 के तहत तय समय-सीमा से महीनों बाद तैयार की गई जांच रिपोर्ट पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
दूसरी ओर, एडिशनल सॉलिसिटर जनरल कनकमेडाला रवींद्र कुमार ने हाईकोर्ट के आदेश का बचाव करते हुए कहा कि न तो किसी चश्मदीद से पूछताछ हुई, न कोई टिकट बरामद हुआ, और स्टेशन सुपरिटेंडेंट के अनुसार उस समय वहां से कोई ट्रेन गुज़री ही नहीं थी। रेलवे की दलील थी कि यह मामला “खुद को पहुंचाई गई चोट” का है, जो 1989 के एक्ट की धारा 124-A के दायरे से बाहर है।
पिता की गवाही बनी निर्णायक
मृतक के पिता ने शपथ-पत्र में बताया कि उनका बेटा यात्रा से पहले हमेशा टिकट खरीदता था, और अपनी दावा अर्ज़ी में उन्होंने यह भी दर्ज कराया कि बेटे का रेलवे टिकट, रूमाल, घड़ी, कंघी और करीब 800-900 रुपये नकद — सभी सामान के साथ खो गए थे। इस पर गौर करने वाली बात यह रही कि रेलवे की ओर से पेश दोनों गवाहों ने जिरह के दौरान यह स्वीकार किया कि उन्होंने टिकट के लिए पीड़ित की जेबों की तलाशी ही नहीं ली थी।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां
बेंच ने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रीना देवी मामले में तय हो चुके सिद्धांत को दोहराते हुए कहा कि टिकट न मिलना इस तथ्य को गलत साबित नहीं करता कि पीड़ित वास्तव में एक वैध यात्री था। कोर्ट के अनुसार दावेदार ज़रूरी तथ्यों का हलफ़नामा देकर अपनी शुरुआती ज़िम्मेदारी (prima facie burden) पूरी कर सकता है, जिसके बाद असली ज़िम्मेदारी रेलवे पर स्थानांतरित हो जाती है।
इस सिद्धांत को लागू करते हुए अदालत ने माना कि पिता की गवाही से यह शुरुआती ज़िम्मेदारी पूरी हो चुकी थी, और चूंकि रेलवे के अपने गवाहों ने पीड़ित की जेबें कभी न जांचने की बात स्वीकार की, इसलिए रेलवे अपने हिस्से का बोझ नहीं उठा सका।
कोर्ट ने एक व्यावहारिक तर्क भी दिया — पीड़ित की मौत से पहले उसे एक महीने से अधिक समय तक अस्पताल में भर्ती रखा गया था, जिससे इस बात की संभावना बेहद कम हो जाती है कि इतने लंबे समय बाद तक उसका टिकट सुरक्षित बचा रहेगा। बेंच ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने टिकट की अनुपस्थिति को ज़रूरत से अधिक तवज्जो दे दी, जबकि पिता के शपथ-पत्र और अस्पताल में भर्ती रहने की अवधि जैसे अहम पहलुओं की अनदेखी कर दी।
इसके अलावा अदालत ने पाया कि 2003 के नियमों के तहत रेलवे की जांच रिपोर्ट घटना के करीब सात महीने बाद, और दावा अर्ज़ी दाखिल होने के बाद तैयार की गई — यानी बिना किसी उचित वजह के हुई यह देरी रेलवे के खिलाफ जाती है, इसलिए इस रिपोर्ट को नज़रअंदाज़ किया जाना उचित है।
अंततः कोर्ट ने यह भी दोहराया कि प्रभाकरन विजया कुमार मामले में तय सिद्धांत के अनुसार धारा 124-A के तहत रेलवे पर “सख्त दायित्व” (strict liability) लागू होता है, यानी संभावनाओं के आधार पर एक बार यात्री का असली होना साबित हो जाए तो मुआवज़े का दायित्व रेलवे पर आ जाता है।
फैसले का असर
इन सभी बिंदुओं को आधार बनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के मूल फैसले को बहाल किया। साथ ही रेलवे को निर्देश दिया गया कि वह तीस दिनों के भीतर मुआवज़े की पूरी राशि का भुगतान करे।
केस: सुखाभाई नानजीभाई मकवाना एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया
यह फैसला उन तमाम परिवारों के लिए राहत की तरह है जो किसी रेल दुर्घटना में अपने परिजन को खोने के बाद केवल इसलिए मुआवज़े से वंचित रह जाते थे क्योंकि दुर्घटनास्थल से टिकट बरामद नहीं हो पाता था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य और शपथ-पत्र पर दिए गए बयान भी दावे को साबित करने के लिए पर्याप्त आधार हो सकते हैं, बशर्ते रेलवे अपनी तरफ से यह साबित न कर पाए कि पीड़ित अवैध रूप से यात्रा कर रहा था।




