सीनियर अधिकारी को जूनियर से कम वेतन नहीं मिल सकता, सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कानून
सरकारी और सार्वजनिक संस्थानों में वेतन विसंगति (सैलरी एनोमली) का मुद्दा वर्षों से कर्मचारियों के लिए सिरदर्द बना रहा है। कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि किसी पद पर बाद में नियुक्त हुआ जूनियर कर्मचारी, अपने सीनियर से ज़्यादा वेतन पाने लगता है। सुप्रीम कोर्ट ने अब इस पूरे मसले पर एक बेहद स्पष्ट और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जो लाखों सरकारी कर्मचारियों और शिक्षण संस्थानों के लिए मिसाल बनेगा।
क्या है पूरा मामला
यह मामला अलीगढ़ स्थित धर्म समाज कॉलेज से जुड़ा है, जहां जय प्रकाश सिंह और डॉ. प्रदीप कुमार दोनों को 1990 में एक ही दिन लेक्चरर के पद पर नियुक्त किया गया था। अपीलकर्ता जय प्रकाश सिंह ने अपनी पीएच.डी. उसी साल यानी 1990 में ही पूरी कर ली थी, जबकि डॉ. प्रदीप कुमार को यह डिग्री हासिल करने में 2002 तक का समय लगा।
बावजूद इसके, इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश पर डॉ. कुमार को उनकी पीएच.डी. के आधार पर दो एडवांस इंक्रीमेंट दे दिए गए। नतीजा यह हुआ कि जूनियर सहकर्मी का वेतन अपीलकर्ता से अधिक तय हो गया, जबकि योग्यता और अनुभव में अपीलकर्ता कहीं आगे थे।
कर्मचारी की लड़ाई और हाईकोर्ट का फैसला
जय प्रकाश सिंह ने बराबरी का वेतन पाने के लिए पहले विभागीय अधिकारियों के सामने अपनी बात रखी, लेकिन उनकी मांग ठुकरा दी गई। इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया, मगर 2018 में हाईकोर्ट ने भी उनकी रिट याचिका खारिज कर दी। इससे निराश होकर अपीलकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: “बुनियादी सिद्धांत का उल्लंघन नहीं हो सकता”
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने इस अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि एक ही पद पर काम करने वाले सीनियर को जूनियर से कम वेतन देना बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर किसी जूनियर को सीनियर की तुलना में ज़्यादा वेतन दिया जा रहा है, तो उसके पीछे ठोस और साबित होने लायक वजह होनी ही चाहिए — सिर्फ प्रशासनिक आदेश काफी नहीं है।
आर्टिकल 14 और आर्टिकल 39(d) का हवाला
कोर्ट ने माना कि दोनों कर्मचारियों के वेतन तय करने का तरीका संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 39(d) (समान काम के लिए समान वेतन का निदेशक सिद्धांत) का उल्लंघन करता है। बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि यह निर्विवाद तथ्य है कि दोनों रीडर के पद पर शिक्षा विभाग में कार्यरत थे, और अपीलकर्ता ने अपने सहकर्मी से पहले ही एम.फिल और पीएच.डी. जैसी उच्च योग्यताएं हासिल कर ली थीं।
पद, भर्ती और अनुभव में अंतर साबित नहीं हुआ
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी रेखांकित किया कि योग्यता, भर्ती के स्रोत, अनुभव, ज़िम्मेदारी या जवाबदेही के स्तर पर ऐसा कोई ठोस फर्क रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं था, जिसे समान मूल्य और समान प्रकृति के काम के लिए समान वेतन से इनकार करने का वाजिब आधार माना जा सके। यानी राज्य सरकार यह साबित करने में नाकाम रही कि वेतन में अंतर किसी वास्तविक और तार्किक वजह से था।
सरकारी आदेशों पर संविधान की प्रधानता
सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से पेश वकील ने कुछ सरकारी आदेशों का हवाला देकर वेतन अंतर को सही ठहराने की कोशिश की। इस पर कोर्ट ने साफ कहा कि सरकारी आदेश केवल नीतिगत फैसले होते हैं, और अगर वे संविधान में निहित समानता तथा समान काम के लिए समान वेतन के मूल सिद्धांतों से टकराते हैं, तो संवैधानिक सिद्धांतों को ही प्राथमिकता दी जाएगी। इसी आधार पर कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के विवादित आदेश को रद्द कर दिया और अपील स्वीकार कर ली।
इस फैसले का व्यापक असर
यह फैसला केवल एक कॉलेज के दो शिक्षकों तक सीमित नहीं है। यह हर उस सरकारी विभाग, शिक्षण संस्थान और सार्वजनिक उपक्रम के लिए एक नज़ीर है, जहां वेतन तय करने में मनमानी या प्रशासनिक लापरवाही के चलते सीनियर कर्मचारियों को नुकसान उठाना पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संदेश दिया है कि वेतन विसंगति से जुड़े प्रशासनिक आदेशों की समीक्षा जब भी अदालत में हो, तो संविधान के समानता के सिद्धांत को केंद्र में रखा जाएगा।




