बच्चों के भरण-पोषण पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: “जिम्मेदारी दोनों की, पर बँटवारा सिर्फ गणित से नहीं”
सुप्रीम कोर्ट ने 20 अगस्त 2026 को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि बच्चों के भरण-पोषण (Child Maintenance) की जिम्मेदारी भले ही माता-पिता दोनों की हो, लेकिन इसे केवल गणित या आय के आधार पर बराबर-बराबर नहीं बांटा जा सकता।
यह फैसला ‘सुजाता कुमारी बनाम राहुल कुमार (Sujata Kumari v. Rahul Kumar)’ मामले में आया है, जहाँ सुप्रीम कोर्ट ने अलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया था जिसमें माँ की कमाई के आधार पर पिता की जिम्मेदारी आधी कर दी गई थी।
📌 केस का संक्षिप्त परिचय (Case Background)
यह मामला एक डॉक्टर दंपत्ति का है। पत्नी (सुजाता कुमारी) एक स्त्री रोग विशेषज्ञ (Gynaecologist) हैं और पति (राहुल कुमार) एक बाल रोग विशेषज्ञ (Paediatrician) हैं।
- माँ की मासिक आय: लगभग ₹1,50,000 (एक लाख पचास हजार रुपये)
- पिता की मासिक आय: लगभग ₹2,00,000 (दो लाख रुपये)
- बच्चे: दो नाबालिग बेटियाँ (लगभग 8 और 9 वर्ष की आयु)
- कस्टडी: बेटियाँ माँ के साथ रह रही हैं।
⚖️ कोर्टों का सफर: फैमिली कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक
इस मामले में तीन अलग-अलग कोर्टों ने अलग-अलग राय दी, जो इस बात को साबित करता है कि यह कितना पेचीदा मुद्दा रहा है।
| कोर्ट (Court) | फैसला (Decision) | तर्क (Reasoning) |
|---|---|---|
| फैमिली कोर्ट | पिता को ₹30,000 प्रति माह प्रति बच्ची (कुल ₹60,000) देने का आदेश। | बच्चों की जरूरतों और पिता की आय को ध्यान में रखते हुए। |
| अलाहाबाद हाईकोर्ट | राशि को आधा (₹15,000 प्रति बच्ची) कर दिया। | हाईकोर्ट का तर्क था कि चूंकि माँ भी कमाती है (₹1.5 लाख), इसलिए वित्तीय बोझ दोनों पर बराबर होना चाहिए। |
| सुप्रीम कोर्ट | फैमिली कोर्ट का आदेश बहाल (₹30,000 प्रति बच्ची)। | कोर्ट ने कहा कि माँ की कमाई पिता की जिम्मेदारी को ‘गणितीय रूप से’ आधा नहीं कर सकती। |
🏛️ सुप्रीम कोर्ट का मुख्य तर्क: “देखभाल को पैसों से नहीं तोला जा सकता”
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने जो अवलोकन दिए, वे पारिवारिक कानून के इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण हैं।
1. गणित बनाम जिम्मेदारी (Arithmetic vs. Responsibility)
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भले ही कानूनन दोनों माता-पिता बच्चों को पालने के लिए जिम्मेदार हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि खर्चे को 50-50 के फॉर्मूले से बांटा जाए। कोर्ट ने कहा, “The obligation to maintain the children is shared by both parents, but it cannot be divided by arithmetic alone.” (बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी दोनों माता-पिता की साझा है, लेकिन इसे केवल अंकगणित से विभाजित नहीं किया जा सकता।)
2. माँ का ‘अदृश्य योगदान’ (Invisible Contribution of Mother)
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि जिस माँ के पास बच्चों की कस्टडी है, वह सिर्फ पैसे ही नहीं लगाती। वह बच्चों की दैनिक देखभाल, भावनात्मक सहारा, स्कूल का काम, स्वास्थ्य और परवरिश का पूरा बोझ उठाती है।
- कोर्ट ने कहा कि यह ‘Non-monetary contribution’ (गैर-मौद्रिक योगदान) अक्सर पैसे के योगदान से भी बड़ा होता है।
- इसलिए, माँ के पास बच्चों का रहना और उनकी देखभाल करना एक ऐसा योगदान है जिसे पैसों में नहीं तोला जा सकता और न ही इसे पिता की वित्तीय जिम्मेदारी से काटा जा सकता है।
3. पिता की प्राथमिक जिम्मेदारी (Primary Obligation of Father)
भारतीय कानून (विशेषकर Section 125 CrPC) के तहत, नाबालिग बच्चों के भरण-पोषण की प्राथमिक जिम्मेदारी पिता पर होती है। माँ की आर्थिक रूप से सक्षम होना पिता की इस कानूनी बाध्यता को खत्म नहीं करती।
💡 इस फैसले का आम लोगों पर क्या असर होगा?
इस फैसले का सीधा असर तमाम चल रहे और भविष्य के तलाक या अलगाव के मामलों पर पड़ेगा।
- पिताओं के लिए: अब पिता यह तर्क देकर कि “पत्नी भी कमाती है,” बच्चों के मेंटेनेंस (Maintenance) से बच नहीं सकते या राशि कम नहीं करवा सकते।
- माताओं के लिए: यह फैसला उन माताओं के लिए राहत की सांस है जो तलाक के बाद बच्चों की जिम्मेदारी अकेले उठा रही हैं और कोर्ट में कम मेंटेनेंस मिलने से परेशान थीं।
- कानूनी स्पष्टता: देश भर की हाईकोर्ट्स और फैमिली कोर्ट्स अब इसी सिद्धांत का पालन करेंगी कि मेंटेनेंस का फैसला करते समय केवल सैलरी स्लिप नहीं, बल्कि बच्चों की परवरिश में लगने वाले समय और मेहनत को भी देखा जाएगा।
📜 कानूनी प्रावधान (Legal Provisions Involved)
यह मामला मुख्य रूप से दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत था, जो पत्नी और बच्चों के भरण-पोषण से जुड़ी है। हालांकि, अब नए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के लागू होने के बाद भी, बच्चों के हित (Best Interest of Child) का सिद्धांत सर्वोपरि रहेगा।
✅ निष्कर्ष (Conclusion)
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने साबित कर दिया है कि कानून सिर्फ किताबों की बात नहीं करता, बल्कि वह जमीनी हकीकत को भी समझता है। बच्चों की परवरिश में माँ का लगाया गया पसीना और समय उतना ही कीमती है जितना पिता की कमाई। इसलिए, अब से कोर्ट में “माँ कमाती है, तो पिता आधा दे” वाला पुराना गणित नहीं चलेगा।



