FIR रद्द याचिका खारिज करते समय हाईकोर्ट पुलिस को धारा 41A CrPC का पालन करने का निर्देश नहीं दे सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब हाईकोर्ट किसी FIR को रद्द करने से इनकार कर देता है, तो वह पुलिस को आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 41A की प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करने का अलग से निर्देश नहीं दे सकता। अदालत ने कहा कि यदि आरोपी धारा 41A के तहत जारी नोटिस पर नियमित रूप से पेश हो रहा है, तो ऐसी स्थिति में गिरफ्तारी पर स्वतः रोक जैसा प्रभाव पैदा हो सकता है, जो इस चरण में दी जाने वाली अंतरिम राहत के समान है और इसे FIR रद्द करने की याचिका पर विचार करते समय नहीं दिया जा सकता।
बेंच, सिद्धांत और कानूनी तर्क
यह फैसला जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने सुनाया। बेंच ने कहा कि जब याचिका केवल FIR रद्द करने की मांग पर आधारित हो, तो हाईकोर्ट द्वारा जांच अधिकारी को CrPC की धारा 41A का पालन करने का निर्देश देना इस बात के बराबर है कि अदालत अप्रत्यक्ष रूप से ऐसा संरक्षण दे रही है जिस पर वह केवल तभी विचार कर सकती थी, जब FIR रद्द करने का प्रथम दृष्टया मामला स्थापित हो जाता।
कोर्ट ने यह भी दोहराया कि CrPC की धारा 482 के तहत लंबित कार्यवाही के दौरान सामान्य रूप से कोई अंतरिम राहत नहीं दी जा सकती, जब तक कि याचिका के गुण-दोष पर विचार न हो जाए, सिवाय किसी असाधारण स्थिति के। ऐसी असाधारण अंतरिम सुरक्षा देते समय भी हाईकोर्ट को अपने आदेश में संक्षिप्त लेकिन स्पष्ट कारण दर्ज करना अनिवार्य है, जैसा कि नीहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर (प्रा.) लि. बनाम महाराष्ट्र राज्य, (2021) 19 SCC 401 में निर्धारित किया गया है।
धारा 41A CrPC (BNSS धारा 35) की भूमिका
कोर्ट ने संक्षेप में समझाया कि CrPC की धारा 41A (अब BNSS की धारा 35) के तहत पुलिस को ऐसे संज्ञेय अपराधों के मामलों में, जहाँ तुरंत गिरफ्तारी आवश्यक न हो, सीधे गिरफ्तार करने के बजाय लिखित नोटिस के माध्यम से आरोपी को पेश होने के लिए बुलाने की प्रक्रिया अपनानी होती है। यह व्यवस्था मनमानी गिरफ्तारी को रोकने और उचित प्रक्रिया (due process) सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बनाई गई है, ताकि गिरफ्तारी अपवाद हो और समन/नोटिस सामान्य नियम के रूप में लागू हो।
मामला: तेलंगाना हाईकोर्ट का आदेश
यह विवाद तेलंगाना हाईकोर्ट के उस आदेश से संबंधित था जिसमें आरोपियों की FIR रद्द करने वाली याचिकाओं को निपटाते हुए हाईकोर्ट ने पुलिस को CrPC की धारा 41A का पालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था। साथ ही, प्रतिवादी नंबर 2 और 3 (आरोपी) को पुलिस के समक्ष पेश होने के लिए भी निर्देशित किया गया था।
इस आदेश से असंतुष्ट शिकायतकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की और तर्क दिया कि याचिकाओं पर फैसला करते समय उसकी उपस्थिति के बावजूद उसे सुनने का अवसर नहीं दिया गया। शिकायतकर्ता ने यह भी कहा कि पुलिस को धारा 41A का पालन करने का निर्देश देना आरोपियों को गिरफ्तारी से अस्वीकार्य अंतरिम सुरक्षा प्रदान करने जैसा है, जो नीहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर के फैसले में तय सिद्धांतों के प्रतिकूल है।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट का विवादित आदेश रद्द कर दिया और कहा कि हाईकोर्ट से गलती हुई क्योंकि उसने FIR रद्द करने की याचिकाओं का निपटारा करते समय आरोपियों को अप्रत्यक्ष रूप से अंतरिम राहत दे दी, जबकि ऐसा संरक्षण केवल तब विचारणीय होता जब FIR रद्द करने का प्रथम दृष्टया आधार स्थापित हो जाता। मामले को फिर से विचार के लिए हाईकोर्ट को वापस भेज दिया गया, इस निर्देश के साथ कि वास्तविक शिकायतकर्ता (अपीलकर्ता) को नोटिस देकर उसकी बात सुनी जाए और उसके बाद ही अंतिम आदेश पारित किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि जब तक हाईकोर्ट पुनः निर्णय नहीं दे देता, तब तक आरोपी व्यक्तियों, अर्थात् प्रतिवादी नंबर 2 और 3 के खिलाफ कोई जबरदस्ती की कार्रवाई नहीं की जाएगी।
मामले का नाम
PRACTICAL SOLUTIONS INC. (THR. AUTHORIZED REPRESENTATIVE) बनाम THE STATE OF TELANGANA & ORS.

